तुलसी के ऊपर दिए रखने से क्या कठिनाई आ सकती हैं

सनातन हिंदू धर्म में तुल के पौधे का

महत्व सबसे अध है इसकी सबसे पहले पूजा

भगवान विष्णु जी ने की थी श्री ह कहते हैं

जिस प्रकार से देवी लक्ष वैकुंठ को

ऐश्वर्य प्राप्त है उस प्रकार से वैकुंठ

में तुल के कारण ही पवित्रता प्राप्त है

पृथ्वी लोक पर जिस स्थान भी तुल का पौधा

होगा उस स्थान

परभ हमारे घर में तुलसी का पौधा अवश्य ही

लगाना चाहिए तुलसी के पास दीपक जलाने से

क्या होता है आइए जानते हैं इस प्राचीन

महान कथा के माध्यम से जो भगवान श्री

कृष्ण ने देवी सत्यभामा को सुनाई है

दोस्तों एक समय की बात है देवी सत्यभामा

भगवान श्री कृष्ण के पास आकर उनसे पूछने

लगती है हे स्वामी आपने मुझे तुलसी के

पौधे को जल देने का महात्म सुना दिया है

ले लेकिन तुलसी के पास दीपक जलाने का क्या

महा हाम है रोज शाम को तुलसी के पास दीपक

क्यों जलाया जाता है इससे मनुष्य को कौन

सा फल प्राप्त होता है तुलसी के पास दीपक

जलाने की विधि क्या है तथा दीपक लगाते समय

कौन से मंत्र का उच्चारण करना चाहिए कृपया

आप मुझे विस्तार से बताइए भगवान श्री

कृष्ण न कहते हैं हे देवी आज तुमने समस्त

संसार के कल्याण की भावना से बहुत ही

उत्तम प्रश्न किया है तुम्हारे इस प्रश्न

का उत्तर देने से पूर्व मैं तुम्हें एक

प्राचीन इतिहास सुना हूं जिससे तुम्हें

तुम्हारे सभी प्रश्नों के उत्तर मिल

जाएंगे शाम को तुलसी के पास दीपक जलाने से

जो फल मिलता है उसी का वर्णन मैं इस कथा

में करूंगा इसीलिए तुम इस कथा को ध्यान

पूर्वक सुनना इस कथा को ध्यान से पूरा

सुनने मात्र से ही मनुष्य को वर्षों

तक तुलसी के पास दीपक जलाने का पुण्य

प्राप्त होता है देवी सत्यभामा कहती है हे

प्रभु मैं इस कथा को सुनने के लिए उत्सुक

हूं कृपया आप इस कथा को मुझसे कहिए तब तब

भगवान श्री कृष्ण देवी सत्यभामा को वह कथा

सुनाने लगते हैं हे देवी पूर्व काल की बात

है दक्षिण दिशा में तुंग भद्रा नाम की एक

बहुत बड़ी नदी है उसी नदी के किनारे पर

हरिहरपुर नाम का एक अत्यंत सुंदर नगर बसा

हुआ है उसी नगर में हरि दीक्षित नाम के एक

ब्राह्मण निवास करते थे वे अत्यंत गुणवान

चरित्रवान धर्म कार्य करने वाले तथा वेदों

के मार्ग पर चलने वाले थे उन्होंने समस्त

शास्त्र का अध्ययन किया हुआ था उसी

ब्राह्मण की एक पत्नी थी जिसे लोग दुराचार

कहकर पुकारते थे क्योंकि उसके कर्म ही

उसके नाम के अनुसार थे वह सदैव ही अपने

पति को अपमानित करती थी अपने पति के लिए

कुवा च्य कहती थी पति को भयंकर दुख देती

थी पति के लिए कभी भोजन नहीं बना आती थी

उसने उसके पति के साथ कभी शयन नहीं किया

कभी उसके साथ प्रेम से व्यवहार नहीं किया

पति के मित्र परिवार के लोग घर पर आते तो

वह स्त्री उनको अपमानित करके भगा दिया

करती थी और स्वयं काम भाव से उन्मत होकर

निरंतर अन्य व्यभिचारिणी स्त्रियों के साथ

घुमा करती थी उसका मन पति को छोड़कर पराय

पुरुषों में

लगा रहता था उसने कभी अपने पति से प्रेम

से बात नहीं की किंतु पराए सुंदर सुंदर

पुरुषों के संग बैठकर बातें करती थी पराए

पुरुषों को मोहित करने के लिए सज धज कर

गांव में घूमने जाया करती थी कभी वह वन

में किसी वृक्ष के नीचे खड़ी रहकर सुंदर

पुरुषों की राह देखने लगती और किसी दुष्ट

पुरुष को मोहित करके उसके संग भोग विलास

किया करती थी फिर एक दिन वह दुराचार

स्त्री वन में जाकर एक वृक्ष के नीचे खड़ी

हो गई उसका चित्त काम से भरा हुआ था वह

किसी सुंदर कामी पुरुष की राह देख रही थी

किंतु बहुत समय निक चलने के बाद भी उस थान

पर कोई पुरुष नहीं आया इसीलिए वह अत्यंत

दुखी हो गई और प्रियतम की खोज में इधर-उधर

देखने लगी उस दिन उसका साथ सारा परिश्रम

व्यर्थ हो गया वहां पर खड़ी होकर वह नाना

प्रकार की बातें कहकर विलाप करने लगी हाय

आज तो इस मार्ग से कोई भी सुंदर पुरुष

नहीं आया अब मैं कैसे अपनी काम शांति करूं

आज की रात कैसे बीतेगी वह जोर-जोर से

विलाप करने लगी उसी जंगल में एक भयानक बाघ

निवास करता था उस पापिनी स्त्री की आवाज

सुनकर वह जाग गया और उछलकर उस स्त्री का

भक्षण करने के लिए उसके पास आ गया उस

भयंकर बाग को देखकर

उस री के पसीने छूटने लगे वह भय से थरथर

कांपने लगी वह स्त्री कुछ करती इतने में

ही उस बाघ ने अपने पंजे से उसे घायल कर

दिया और वह स्त्री जमीन पर गिर पड़ी जमीन

पर गिरते ही वह स्त्री चिल्लाते हुए बोली

अरे बाख तू किस लिए यहां पर आया है मुझे

क्यों मार रहा है मैं यहां पर अपने

प्रियतम को खोज रही थी तू मुझे छोड़ दे

मेरा भक्षण करके तुझे क्या मिलेगा उस

स्त्री की यह बात सुनकर वह भयानक बाग क्षण

भर के लिए रुक गया और हंसता हुआ बोलने लगा

है दुष्टा आज विधाता ने तुझे मेरा ग्रास

नियुक्त किया है तुझ जैसी

पापिनी स्त्रियों को भक्षण करना ही मेरा

काम है तभी मुझे इस शरीर से मुक्ति मिलेगी

वह स्त्री कहने लगी हे बाख तुम कौन हो

मुझे सच सच बताओ तुम्हें किस कारण से बाग

होना पड़ा और तुम मुझ जैसी स्त्रियों का

भक्षण क्यों करते हो पहले मुझे सारी बात

बताऊं और फिर मेरा भक्षण करो फिर वह बाग

कहने लगता है हे पापिनी मैं तुझे मेरे

पूर्व जन्म का वृतांत सुनाता हूं किस कारण

से मुझे बाग होना पड़ा पूर्व काल में

दक्षिण देश में मल्ला पहा नाम की एक नदी

है उस नदी के तट पर एक मुनि परणा नाम की

नगरी बसी हुई है उसी नगरी में मैं निवास

करता था मैं एक ब्राह्मण का पुत्र था और

नदी किनारे बैठकर यज्ञ आदि कार्य किया

करता था मैंने उस जन्म में अनेक पापियों

के लिए यज्ञ किए उन पापियों के घर का भोजन

किया मैंने धन के लोभ से अनेक पापियों के

लिए कार्य किए जिन वस्तुओं का दान

ब्राह्मण को नहीं लेना चाहिए उन वस्तुओं

का दान भी मैंने ग्रहण किया आरण लेने के

बहाने से दूसरों से धन लेता था लेकिन कभी

वापस नहीं करता था इस प्रकार से पाप करते

हुए मुझे बहुत साल बीत गए और मैं बूढ़ा

हूं गया मेरे बाल सफेद हो गए आंखें सूझ गई

मुंग के सारे दांत गिर गए लेकिन फिर भी

मेरी दान लेने की आदत नहीं छूटी और मैं

पाप करता गया फिर एक दिन मैं धन के लोभ से

नदी किनारे गया और अन्य धूर ब्राह्मणों के

साथ मिलकर हमने लोगों को ठगा झूठे मंत्र

वचन बोलकर हमने बिना विधि किए ही देवी

देवताओं का पूजन किया और बहुत सारा धन दान

में ले लिया फिर उसी स्थान पर एक बीमार

कुत्ते ने मेरे पैर में काट लिया और मैं

मूर्छित होकर गिर पड़ा उसी क्षण मेरे

प्राण चले गए फिर यम के दो दूत उस स्थान

पर प्रकट हुए और मुझे पकड़कर यमपुरी ले गए

वहां पर यमराज ने चित्रगुप्त से मेरे

कर्मों का लेखा जोखा निकालने के लिए कहां

फिर चित्रगुप्त कहने लगे हे धर्मराज इस

ब्राह्मण ने घोर पाप किए हैं इसने दूसरों

से झूठ कहकर धन लूटा है विधि से पूजा ना

करके झूठे मंत्र बोलकर भगवान का अपमान

किया है इसीलिए यह पापी ब्राह्मण केवल नरक

जाने के ही योग्य है फिर यमराज ने अपने

दूतों को आदेश देकर मुझे नरक की अग्नि में

डाल दिया अनेक वर्षों तक नरक की सजा भोगने

के बाद मुझे बाग का शरीर प्राप्त हुआ और

मैं इस दुर्गम वन में निवास करने लगा मैं

अपने पूर्व जन्म के पापों को याद करके कभी

महात्मा साधु पुरुष सती स्त्रियों का

भक्षण नहीं करता हू मैं केवल पापी

दुराचारी तथा कुलटा स्त्रियों का ही भक्षण

करता हूं ताकि मुझे पाप से मुक्ति मिल जाए

इस प्रकार से उस बाघ ने अपने पूर्व जन् का

वृतांत सुना दिया और उस स्त्री से कहने

लगा

है पापिनी तेरे आचरण से तू कुलटा दिखाई

पड़ती है अपने पति को छोड़कर तू इस वन में

अन्य पुरुष के साथ भोग विलास करने के लिए

आई है इसीलिए आज तू मेरा ग्रास अवश्य

बनेगी इतना कहकर उस बाघ ने अपने तीक्षण

नखो से उस पापी स्त्री के टुकड़े-टुकड़े

करके उसे खा लिया फिर उस स्थान पर यम के

दो दूत प्रकट हुए और उस पापिनी स्त्री को

उठाकर संयम नी पूरी में ले गए वहां पर उसे

यमराज के सामने खड़ा किया गया फिर

चित्रगुप्त ने उस स्त्री का लेखा झोखा

निकालते हुए यमराज से कहने लगे हे धर्मराज

यह स्त्री तो अत्यंत पापिनी है इसने

घोर पाप किए हैं इसने व्यभिचार किया है

इसने अपने पति की कभी सेवा नहीं की अपने

पति को भूलकर पराए पुरुषों के संग भोग

विलास किया करती थी उसके पापों को सुनकर

यमराज ने उस स्त्री को अग्नि से भरे हुए

कुंडों में डालने का आदेश दिया अनेक

वर्षों तक उसे उस कुंड में पकाया गया फिर

उसे निकालकर ररव नामक नरक में डाल दिया

गया इस प्रकार से उसे अनेक वर्षों तक

अलग-अलग नर्कोडुरु वह महापाप स्त्री पुनः

पृथ्वी लोक पर आकर चांडाल के रूप में

उत्पन्न हुई चांडाल के घर में जन्म लेकर

वह फिर से अनेक पाप करने लगी व्यभिचार

करने लगी अनेक पापी पुरुषों के संग विहार

करने लगी फिर कुछ समय बाद पूर्व जन्म के

पापों के कारण उसे कोण का रोग हो गया और

वह भयानक पीड़ा सहन करने लगी उसका अंगअंग

जलने लगा उसके नेत्रों में पीड़ा होने लगी

इस दुख को सहन करती हुई वह दिन बिताने लगी

फिर एक दिन वह तीर्थ में स्नान करने के

उद्देश्य से अंतपुर में चली गई वहां पर वह

एक आश्रम के बाहर निवास करने लगी उस आश्रम

में एक तुलसी का पौधा था अन्य स्त्रियों

को वहां पर तुलसी के पास दीपक जलाते हुए

देखकर उस पापी स्त्री ने भी वही किया उसने

तुलसी के पौधे के पास एक

दीपक जला दिया फिर उसी रात हृदय फटने से

उसकी मृत्यु हो गई और यमराज के दो दूत उसे

ले जाने के लिए वहां पर प्रकट हुए जैसे ही

यम के दूत उस उस पापी स्त्री को पाश में

बांध कर ले जाने लगे भगवान विष्णु के दो

पार्षद उस स्थान पर प्रकट हुए और उन्होंने

उन दूतों को रोक लिया और कहने लगे हे

दूतों इस स्त्री को तुम छोड़ दो यह स्त्री

नरक जाने के योग्य नहीं है है तुम किसके

आदेश से ऐसा अधर्म कर रहे हो फिर यम के

दूत कहने लगे हे पार्षदों हम यमराज के

आदेश से इस पापी स्त्री को उठाकर ले जा

रहे हैं किंतु आप हमें किस कारण से

रोक रहे हो यह स्त्री अत्यंत पापी है से

नरक में ले जाने की आज्ञा मिली है फिर

पार्षद कहने लगे हे दूतों यह स्त्री तो

विष्णु भक्त है यह नरक जाने के योग्य नहीं

है इसने शाम को तुलसी के पास दीपक जलाया

है इसी कारण से इसके समस्त पाप नष्ट हो गए

हैं इसीलिए अब यह नरक जाने के योग्य नहीं

है है यह स्वर्ग जाने की अधिकारी बन चुकी

है पार्षदों की बात सुनकर उन यमदू तों ने

उस स्त्री को उसी स्थान पर छोड़ दिया और

यमलोक लौट गए वहां जाकर उन्होंने यमराज को

सारा वृतांत सुना दिया फिर भगवान विष्णु

के पार्षद उस स्त्री को

दिव्य विमान में बिठाकर स्वर्ग लोक ले गए

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं हे देवी

सत्यभामा इस प्रकार से तुलसी के पास केवल

दीपक जलाने मात्र से ही मनुष्य के सभी पाप

नष्ट हो जाते हैं जो स्त्री नित्य शाम को

तुलसी के पास दीपक जलाती है वह

सौभाग्यशाली बनती है उसके पूर्व जन्मों के

सभी पाप नष्ट हो जा जाते हैं उसे सुख

समृद्धि की प्राप्ति होती है रोज तुलसी के

पास दीपक जलाते समय इस मंत्र का उच्चारण

करना चाहिए ओम तुलसी देव्य च विद्महे

विष्णु प्रिय यायच धीमही तन्नो वृंदा

प्रचोदयात श्री कृष्ण कहते हैं हजारों

अमृत के

घड़ों से नहलाने पर भी श्री हरि को उतनी

तृप्ति नहीं होती जितनी वे मनुष्यों के

द्वारा तुलसी का एक पत्ता चढ़ाने से

प्राप्त करते हैं एक सहज गोदान से मानव जो

फल प्राप्त करता है वही फल तुलसी पत्र के

दान से पा लेता है जो मृत्यु के समय अपने

मुख में तुलसी पत्र का जल पा जाता है वह

संपूर्ण पापों से मुक्त होकर श्री कृष्ण

के धाम जाता है तो दोस्तों इस प्रकार से

भगवान श्री कृष्ण ने तुलसी के पौधे के पास

दीपक जलाने का महत्व बताया है आपको यह कथा

कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताएं जानकारी

अच्छी लगी तो वीडियो को लाइक जरूर

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