नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री माता की कथा

हरे कृष्णा या देवी

सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता

नमस्तस्ये

नमस्तस्ये

नमः नवरात्रि यानी शक्ति की उपासना के दिन

वर्ष में ऐसी दो बार नवरात्रि आती है एक

है चैत्र मास की नवरात्रि और एक है अश्विन

मास की नवरात्रि और इस समय चैत्र मास की

नवरात्रि का आरंभ हो चुका है जैसा कि हमने

नवरात्रि की पिछले वीडियो में सुना था कि

हमें इस भौतिक दुर्ग से मुक्त होने के लिए

देवी दुर्गा के दिव्य आशीर्वाद और

मार्गदर्शन की परम आवश्यकता पड़ती है देवी

दुर्गा और कोई नहीं बल्कि भगवान श्री

कृष्ण की बहिरंगा शक्ति है और हमें उनकी

सेवा में संलग्न करती है तो चलिए चैत्र

नवरात्रि के इन नौ शुभ दिनों में हम

प्रत्येक दिन की देवी दुर्गा की सुंदर

पौराणिक कथा का श्रवण करते हैं नवरात्रि

में मां दुर्गा के नौ विभिन्न स्वरूपों की

पूजा की जाती है देवी के यह रूप शास्त्रों

में इस श्लोक द्वारा उल्लेखित है प्रथमं

शैल पुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी

तृतीय चंद्र

घंटे कुष मांडे चतुर्थ कम पंचम स्कंध

माते षष्टम कात्यायनी च सप्तम

कालरात्रि महा गौरी ति चष्मा

नव मम सिद्धि दात्री च नव दुर्गा

प्रकीर्ण नी

नामानि ब्रह्म णव महात्म

नः अर्थात देवी दुर्गा के नौ रूप है मां

शैलपुत्री मां ब्रह्मचारिणी मां चंद्रघंटा

मां कुष्मांडा मां स्कंद माता मां

कात्यायनी मां कालरात्रि मां महाग और मां

सिद्धि दात्री इस श्लोक के अनुसार चैत्र

नवरात्रि के प्रथम दिन देवी दुर्गा के जिस

स्वरूप की पूजा होती है उनका अति सुंदर

नाम है माता शैलपुत्री जैसा कि इस शब्द से

ही इंगित होता है कि माता शैलपुत्री

पर्वतराज हिमालय की पुत्री है यदि उनके

आध्यात्मिक स्वरूप पर दृष्टि डाली जाए तो

हम देखते हैं कि उनका वर्ण श्वेत है और वे

श्वेत रंग के ही वस्त्र धारण करती है उनके

दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल

का पुष्प सुशोभित है माता शैलपुत्री वृषभ

अर्थात बैल की सवारी करती है जिसके कारण

इनका एक प्रसिद्ध नाम वृषा रूढ़ा भी है तो

चलिए सबसे पहले दिन आज हम माता शैलपुत्री

की कथा का श्रवण करते हैं जैसा कि हम

जानते हैं कि दक्ष प्रजापति की कन्याएं

थी इनमें से सती नामक कन्या का विवाह दक्ष

की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से हुआ था

एक बार दक्ष प्रजापति ने एक महान यज्ञ का

आयो आयोजन किया तो उसमें भगवान शिव और सती

को छोड़कर सभी देवी देवताओं को आमंत्रित

किया गया जब सती को यह समाचार मिला तो वे

अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए

लालायित हो उठी रुद्र देव के मना करने पर

भी सती नहीं रुकी और अपने पिता के यज्ञ

में पहुंच गई जब दक्ष ने सती के समक्ष ही

भगवान शिव का अपमान किया तो उसे यह सहन

नहीं हुआ और उन्होंने अग्नि में अपनी देह

भस्म कर डाली अपनी प्रिय पत्नी सती के

वियोग में महादेव ने ने भी वैराग्य धारण

कर लिया और वे खोर तपस्या में लीन हो गए

इन्हीं दक्ष प्रजापति की एक और पुत्री थी

जिनका नाम था स्वधा इसका विवाह पितरों के

साथ हुआ था इन पितरों की तीन मानसी

पुत्रियां थी मैना धन्या और कलावती अब

देखिए एक समय ऐसा हुआ कि यह तीनों कन्याएं

भगवान विष्णु के दर्शन करने के लिए श्वेत

द्वीप में पधारी और उसी समय चार कुमार भी

वहां पहुंच गए इन चारों सिद्ध गणों को

देखकर वहां उपस्थित सभी लोगों ने अपने आसन

से उठकर उनका स्वागत सत्कार किया लेकिन

पितरों की यह तीन कन्याएं अपने स्थान से

नहीं उठी यह देखकर चारों कुमार उन पर

क्रोधित हो गए और उन तीनों को स्वर्ग से

दूर होकर नर स्त्री बनने का श्राप दे डाला

इस अभिशाप को सुनकर तीनों कन्याएं उनके

चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगी इन

तीनों पर दया दिखाते हुए चतुष्कोण औरों ने

इन्हें भिन्न-भिन्न वरदान दिए उन्होंने

सबसे बड़ी कन्या मैना को पर्वतराज हिमालय

की पत्नी और देवी पार्वती की माता बनने का

वरदान दिया दूसरी कन्या धन्या को महाराज

जनक की पत्नी और देवी सीता की माता होने

का वरदान दिया तीसरी कन्या कलावती को

वृषभानु वैश्य की पत्नी और देवी राधा की

माता होने का वरदान मिला और इस प्रकार

वरदान पाकर यह तीनों कन्याएं श्वेत द्वीप

से अपने घर लौट आई वरदान के अनुसार प्रथम

कन्या मैना का विवाह पर्वतराज हिमालय से

कर दिया गया विवाह के पश्चात सभी देवी

देवता राजा हिमालय और देवी मैना के पास

पधारे उन्हें कठोर तपस्या करके देवी उमा

को अपनी पुत्री रूप में प्राप्त करने का

अनुरोध करने लगे और ऐसा इसलिए आवश्यक था

क्योंकि उस समय सभी देवी देवता तारकासुर

नामक राक्षस के कोप से त्रस्त हो चुके थे

जिसे केवल महादेव का पुत्र ही मार सकता था

देवी सती के आत्मदाह के कारण यह कार्य

अधूरा रह गया था और अब इस कार्य को पूर्ण

करने के लिए देवी सती को पार्वती के रूप

में अप ना अगला जन्म लेना था देवताओं की

आज्ञा को शिरोधार्य करके राजा हिमालय और

उनकी पत्नी तपस्या में लीन हो गए देवी

मैना सदैव ब्राह्मणों को दान देती बड़े ही

भक्ति भाव से देवी उमा की उपासना करती

पवित्र गंगा नदी के किनारे देवी उमा की

मिट्टी की मूर्ति बनाकर देवी मैना उसे

नाना प्रकार के भोग अर्पण करती कठोर व्रत

का पालन करते हुए कभी निराहार रहती तो कभी

जल पर ही निर्भर रहती एक समय तो उन्होंने

केवल वायु पर ही जीवन यापन किया इस प्रकार

कठोर तपस्या करते हुए उन्हें वर्ष बीत

गए इतने लंबे काल तक तपस्या करने के बाद

जगदंबा उमा देवी मैना से अत्यंत प्रसन्न

हुई और उन्हें दर्शन देकर वरदान मांगने के

लिए कहा तब देवी मैना ने उनसे आग्रह किया

कि वे स्वयं उनकी पुत्री के रूप में

अवतरित हो देवी उमा ने उन्हें यह वरदान

दिया और राजा हिमालय के घर पार्वती के रूप

में अवतरित हुई हिमालय पर्वतों के राजा थे

और पर्वत को शैल भी कहते हैं इसीलिए

पार्वती का एक नाम शैल पुत्री भी पड़ा

उनका एक अन्य नाम हेमवती भी है तो यह थी

माता शैल पुत्री की संक्षिप्त कथा आज

प्रथम नवरात्रि के दिन माता शैल पुत्री की

पूजा आराधना और उपासना की जाती है उनकी

पूजा करने के लिए इस दिन सुबह जल्दी उठकर

स्नान आदि से निवृत्त होना चाहिए इसके बाद

विधिपूर्वक कलश स्थापना करें माता शैल

पुत्री का चित्र भी रखें इसके बाद देवी को

कुमकुम तथा अक्षत अर्पित करें माता शैल

पुत्री का वर्ण श्वेत है इसलिए उन्हें

सफेद रंग के पुष्प अर्पित करना उत्तम

रहेगा इसी प्रकार उन्हें सफेद रंग के

मिष्ठान जैसे कि खीर और चावल भी अत्यंत

प्रिय है आज के दिन माता शैल पुत्री के इस

मंत्र का जाप कर सकते हैं वंदे वांछित

लाभ चंद्रा कृत

शेखरा वृष ढम शुल

धराम शैल पुत्रम यशस्विनी

भगवान शिव की नगरी काशी में माता

शैलपुत्री का एक प्राचीन मंदिर भी है जहां

पर नवरात्रि के प्रथम दिन भारी भीड़ देखने

को मिलती है कहते हैं कि इस मंदिर में

माता शैल पुत्री के दर्शन करने मात्र से

श्रद्धालुओं की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती

है माता शैल पुत्री को वाराणसी भी अत्यंत

प्रिय है इसलिए वेह यहां सदा निवास करती

है वाराणसी शहर भारत के सभी प्रमुख शहरों

से सड़क रेल और हवाई मार्ग से जुड़ा है और

यहां सरलता से पहुंचा जा सकता है तो यह थी

चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैल

पुत्री की कथा अगर आपको यह कथा अच्छी लगी

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हैं तो चलिए चैत्र नवरात्रि के इस प्रथम

दिन माता शैल पुत्री को प्रणाम करते हैं

और उनसे भगवान श्री कृष्ण की शुद्ध भक्ति

की याचना करते हैं हरे

[संगीत]

कृष्ण

[संगीत]

हम

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