नसीब वाले ही सुन पाते है शैलपुत्री माता व्रत कथा

वंदे वांछित ला भाय चंद्र ध कृत शेखरा

बशार शूल धराम शैल पुत्री यशस्विनी

[संगीत]

हम नौ दुर्गा के प्रथम रूप की कथा सुनाते

हैं पावन कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री

माता रानी की महिमा गाते हैं हम कथा

सुनाते हैं हम नौ दुर्गा के प्रथम रूप की

कथा सुनाते हैं पावन कथा सुनाते हैं हम

शैलपुत्री माता रानी की महिमा गाते हैं हम

कथा सुनाते हैं सबसे पावन तेरा नाम शर

पुत्री म तुम्हे प्रणाम सबसे पावन तेरा

नाम शैलपुत्री म तुम्हे

प्रणाम भक्तों मां शैलपुत्री का वास काशी

नगरी यानी वाराणसी में माना जाता है वहां

शैलपुत्री माता का एक बेहद प्राचीन मंदिर

है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां

माता शैलपुत्री के सिर्फ दर्शन मात्र से

भक्त जनों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो

जाती है कहा तो यह भी जाता है नवरात्र के

पहले दिन यानी प्रतिपदा को जो भी भक्त मां

शैलपुत्री के दर्शन करता है उसके वैवाहिक

जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं चूंकि

मां शैलपुत्री का वाहन ऋषभ है इसलिए

इन्हें ष रूढ़ा भी कहा जाता

[संगीत]

है बड़ा ही पावन होता है नौ दुर्गा का

त्यौहार

श्रद्धा भाव से पूजता है माता को

संसार मिटते हैं भक्त जनों के दुख संताप

तमाम हर कष्टों को करता दूर माता जी का

नाम शक्ति पीठों के द्वारा करती है जग

कल्याण मां की महिमा

अपरंपार लीला है महान शास्त्रों में जो

वर्णित है वो बात बताते हैं पावन कथा

सुनाते हैं हम शैलपुत्री माता रानी की

महिमा गाते हैं हम कथा सुनाते हैं सबसे

पावन तेरा नाम शर पुत्री मा तुम्हें

प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम शर पुत्री म

तुम्हे

प्रणाम भक्तों मां शैलपुत्री सती के नाम

से भी जानी जाती है अपने पूर्व जन्म में

सती ने बड़ा ही कठोर तप किया कई वर्षों तक

वो शिव की आराधना में लीन रही एक दिन उनकी

तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने

उन्हें दर्शन दिया और वर मांगने को कहा

सती ने शिव को ही पति के रूप में मांग

लिया शिव के लाख समझाने पर भी जब सती नहीं

मानी तो विवश होकर शिवजी को वरदान देना

पड़ा जब यह बात प्रजापति दक्ष को पता लगी

तो वह कुंठा से भर गए दक्ष भगवान विष्णु

के भक्त थे पर शिव उनको जरा भी पसंद नहीं

थे वह शिव को अघोरी कपाली कहकर अपमानित

करते रहते थे परंतु ब्रह्मा और विष्णु जी

के समझाने पर उन्होंने सती का विवाह शिव

से करा दिया पर दोबारा कभी उन्हें अपने

राज महल में कभी नहीं बुलाया दक्ष के इस

व्यवहार को शिव भली भाति जानते थे परंतु

सती इससे अनभिज्ञ थी तो प्रेम से बोलिए

भक्तों माता शैलपुत्री की

[संगीत]

[प्रशंसा]

जय शैलपुत्री माता को हम सब सती भी कहते

हैं

संग में इनके डमरू धर शिव सदा ही रहते हैं

घोर तपस्या करके सती ने शिव को है

पाया पर यह सब दक्ष राजा को जरा भी ना

भाया अनमन भाव से दक्ष ने सती का विवाह

कराया विदा करने के बाद कभी उनको घर ना

बुलाया

दक्ष के वह वार से शिव चिंतित हो जाते हैं

पावन कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री माता

रानी की महिमा गाते हैं हम कथा सुनाते हैं

सबसे पावन तेरा नाम शर पुत्री म तुम्हे

प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम शर पुत्री म

तुम्हें

प्रणाम

भक्तों सती माता अपने राजमहल को छोड़कर

शिव जी के साथ कैलाश आकर रहने लगी पत्थर

का बिछावन आकाश का छत ध्यान के लिए गुफा

और स्नान के लिए मानसरोवर सब कुछ तो वहां

उपलब्ध था प्राकृतिक सौंदर्य से भरा कैलाश

उन्हें राजमहल से भी ज्यादा अच्छा लगने

लगा माता सती की सेवा में शिव के गण सदा

उपस्थित रहते थे गणों को भी मातृत्व सुख

का सदा सानिध्य मिलता था भक्तो इस प्रकार

भगवान शिव और माता सती सुख शांति से अपना

वैवाहिक जीवन बिताने लगे परंतु होनी तो

होकर रहती है होनी से तो ना नर बच पाए ना

ही नारायण तो प्रेम से बोलिए भक्तों माता

शैल कुत्री की

[संगीत]

जय

सती आकर रहने लगी तब डमरू धर के पास महल

की जगह शिव ने उनको दिया है

कैलाश खुले आकाश के नीचे भी रहती थी वो

प्रसन्न राज महल से भी ज्यादा कैलाश लगे

संपन्न सेवा में शिव गण रहते थे सदा सती

के

साथ गणों के सर पर रहता था मात्र त सुख

कहा हंसी खुशी शिव और सती समय बिताते हैं

पावन कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री माता

रानी की महिमा गाते हैं हम कथा सुनाते हैं

सबसे पावन तेरा नाम शर पुत्री मा तुम्हें

प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम श पुत्री म

तुम्हे

प्रणाम भक्तों एक बार दक्ष प्रजापति ने

यज्ञ करवाने का फैसला किया इसके लिए

उन्होंने सभी देवी देवताओं को निमंत्रण

भेज दिया लेकिन भगवान शिव को नहीं देव

मुनि नारद कैलाश से गुजर रहे थे उनकी

दृष्टि माता सती पर पड़ी नारद जी माता के

पास आए और प्रणाम करके प्रजापति दक्ष

द्वारा आहुति यज्ञ की बात बताए देवी सती

भली भाति जानती थी कि उनके पास निमंत्रण

आएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ वह उस यज्ञ में

जाने के लिए बेचैन थी लेकिन भगवान शिव ने

मना कर दिया उन्होंने कहा कि यज्ञ में

जाने के लिए उनके पास कोई भी निमंत्रण

नहीं आया है और इसलिए वहां जाना उचित नहीं

है तो प्रेम से बोलिए भक्तों माता

शैलपुत्री की

[संगीत]

जय शिव को अपमानित करने को दक्षिण यज्ञ

कराया सबको किया आमंत्रित पर शिव सती को

ना

बुलाया सती को पता चला है जब यज्ञ हवन की

बात सती चली है करने राजा दक्ष से

मुलाकात शिव ने कहा कि सुनो सती वहां ना

तुम

जाओ बिना निमंत्रण जाकर अपमान ना तुम

करवाओ शिव भोले माता सती को बहुत मनाते

हैं पावन कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री

माता रानी की महिमा गाते हैं हम कथा

सुनाते हैं सबसे पावन तेरा नाम शर पुत्री

मा तुम्हें प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम शर

पुत्री म तुम्हे

प्रणाम भक्तों सती नहीं मानी और बार-बार

यज्ञ में जाने का आग्रह करती रही सती ने

शिव से कहा मुझको उस यज्ञ में जाना ही है

वह मेरे पिता का घर है और वहां जाने से

मुझे ना कोई हानि होगी ना ही कोई परेशानी

यह भी संभव है कि पिताजी भूलवश निमंत्रण

ना दे पाए हो इस पर भगवान शिव ने कहा हे

सती वहां केवल तुम्हारा अपमान होगा बिना

निमंत्रण किसी भी उत्सव में जाना उचित

नहीं और वैसे भी यह यज्ञ केवल हमें

अपमानित करने के लिए किया जा रहा है तो

बोलिए भक्तों माता शैल पुत्री की

[संगीत]

जय क्रोधित होकर बोली सती मुझको है

जाना पिता के घर जाने में मुझको क्या

घबराना मेरे जाने से वहां नहीं होगी कोई

भी

हानि मैं हूं उनकी पुत्री वहां होगी नहीं

परेशानी शिव ने कहा कि सुनो सती होगा वहां

अपमान बिना निमंत्रण जाने पर मिलेगा नहीं

सम्मान शिव के वचन माता को आहत कर जाते

हैं पावन कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री

माता रानी की महिमा गाते हैं हम कथा

सुनाते

हैं पावन तेरा नाम शर पुत्री मा तुम्हे

प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम शरण पुत्री को

तुम्ह

प्रणाम भक्तों सती को अपने पिता पर बड़ा

विश्वास था वह नहीं मानी और यज्ञ में जाने

के लिए कैलाश छोड़कर जाने लगी तब भगवान

शिव उनका रास्ता रोक खड़े हो गए परंतु

माता ने इसे से अपना आत्म सम्मान से जोड़

लिया और अपना रद्र रूप दिखाया जिससे दसों

दिशाओं से द महा विधा भयंकर हंकार भरती

प्रकट हुई भक्तों काली तारा छिन मस्ता छड़

शी भुवनेश्वरी त्रिपुर भैरवी धूमावती

बगलामुखी मातंगी वो कमला इन देवियों को द

महा विधा कहा जाता है तंत्र साधना में

इनका महत्त्वपूर्ण भूमिका है सती के ना

मानने की वजह से शिव को उनकी बात माननी

पड़ी और यज्ञ में जाने की अनुमति देनी

पड़ी तो बोलिए भक्तों माता शैल पुत्री की

[संगीत]

[प्रशंसा]

जय क्रोधित होकर सती चली छोड़कर कैलाश

उनको अपने पिता दक्ष पर था बड़ा

विश्वास राह रोक कर खड़े हुए हैं शिव शंभू

त्रिपुरारी तब माता ने दिखलाया है रद्र

रूप बड़ा भारी दसों दिशा से दस महा विधा

आई वहा

नजर यह सब देख के रास्ता तब छोड़े हैं

डमरू धर

नंदी को माता सती संग वो भिजवा हैं पावन

कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री माता रानी की

महिमा गाते हैं हम कथा सुनाते हैं सबसे

पावन तेरा नाम शर पुत्री म तुम्हें प्रणाम

सबसे पावन तेरा नाम शरण पुत्री म तुमहे

प्रणाम

भक्तों सती जब अपने पिता प्रजापति दक्ष के

यहां पहुंची तो देखा कि कोई भी उनसे आदर

प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है सारे

लोग मुंह फेरे हुए हैं और सिर्फ उनकी माता

ने स्नेह से उन्हें गले लगाया उनकी बाकी

बहने उनका उपहास उड़ा रही थी और सती के

पति भगवान शिव को भी तिरस्कृत कर रही थी

ऋषि मुनि यज्ञ हवन कर रहे थे वहां उनके

बैठने के लिए कोई आसन की भी व्यवस्था नहीं

थी यह सब देखकर माता सती का मन बहुत

विचलित हुआ वहां उपस्थित देवता गण भी माता

से नजर नहीं मिला पा रहे थे तो बोलिए

भक्तों माता शैल पुत्री की

[संगीत]

जय नंदी संग पहुंची है सती अपने पिता के

भवन

वहां उपस्थित ऋषि मुनि कर रहे थे यज्ञ

हवन दक्ष अपनी पुत्री को एक बार भी ना

देखा माता के चेहरे पर आई चिंताओं की रेखा

वहां बैठने के लिए भी नहीं था कोई आसन यह

सब देख हुआ विचलित माता सती का मन वहां

उपस्थित देवता भी नजर ना मिलाते हैं पावन

कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री माता रानी की

महिमा गाते हैं हम कथा सुनाते हैं सबसे

पावन तेरा नाम शर पुत्री मा तुम्हें

प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम शरण पुत्री म

तुम्हें

प्रणाम भक्तों स्वयं दक्ष ने भी अपमान

करने का मौका ना छोड़ा दक्ष ने सती से कहा

बिना निमंत्रण के तुमको यहां नहीं आना

चाहिए था क्या उस कपाली ने तुम्हें इतनी

भी शिक्षा नहीं दी संभव है उस कपाली को

खुद भी व्यवहारिक ज्ञान नहीं खुले आकाश के

नीचे पत्थर के बिछावन पर सोने वाले भस्म

भभूत लपेटे उस कपाली से उम्मीद भी क्या की

जा

ऐसा व्यवहार देख सती दुखी हो गई अपना और

अपने पति का अपमान उनसे सहन ना हुआ और फिर

अगले ही पल उन्होंने वह कदम उठाया जिसकी

कल्पना स्वयं दक्ष ने भी नहीं की होगी तो

बोलिए भक्तों माता शैल पुत्री की

[संगीत]

जय कहा दक्षिण बिना बुलाए नहीं था तुमको

आना तेरे उस कपाली ने क्या इतना भी नहीं

जाना सुनो सती तुम लौट जाओ डमरू वाल के

पास छत के नाम पर जिसके पास है खुला

आकाश सती ने कहा कि बहुत हुआ मेरे पति का

अपमान कौन हूं मैं हे प्रजा पति अब तुम भी

लो यह जान सुनके यह सब सारे लोग बड़ा

घबराते हैं पावन कथा सुनाते हैं हम

शैलपुत्री माता रानी की महिमा गाते हैं हम

कथा सुनाते हैं सबसे पावन तेरा नाम शरण

पुत्री मा तुम्हें प्रणाम सबसे पावन तेरा

नाम श पुत्री म तुम्हे

प्रणाम भक्तों माता सती ने दक्ष को अपना

आदि शक्ति स्वरूप दिखाया कहा तुम जिसे

अपनी पुत्री सती को एक अबला नारी समझने की

भूल कर रहे हो परंतु मैं आदि शक्ति हूं और

समस्त संसार को तत क्ण भस्म कर सकती हूं

हे दक्ष तुम्हारी गलती की सजा मैं समस्त

संसार को नहीं दूंगी परंतु तुम्हें गंभीर

परिणाम भुगतने होंगे मैं इसी यज्ञ कुंड की

अग्नि में अपने संसार शरीर का त्याग

करूंगी ऐसा कहकर माता सती ने खुद को अग्नि

को समर्पित कर दिया वहां मौजूद सभी देवी

देवता ऋषि मुनि अनहोनी की आशंका से डर

जाते हैं नंदी आंखों में आंसू लिए कैलाश

की ओर भागते हैं तो बोलिए भक्तों माता श

पुत्री की

[संगीत]

जय माता सती ने वहां अपना विकट रूप

दिखलाया सभी देवों के मन में अब केवल डर

है

समाया माता ने कहा है प्रजापति भुगतो अब

परिणाम इसी यज्ञ कुंड में करूंगी मैं

अग्नि

सना इतना कहकर माता ने खुद को भस्म

किया सबके मन में एका ज्ञात डर ने जन्म

लिया नंदी वापस भाग के कैलाश को जाते हैं

पावन कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री माता

रानी की महिमा गाते हैं हम कथा सुनाते हैं

सबसे पावन तेरा नाम शर पुत्री म तुम्हे

प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम शरण पुत्री

तुमहे

प्रणाम भक्तों भगवान शिव को जैसे ही इसके

बारे में पता चला तो दुखी हो गए दुख और

गुस्से की ज्वाला में जलते हुए शिव का

त्रिनेत्र खुल गया भगवान शिव ने अपने एक

जटा को पत्थर पर टक दिया जिससे भयंकर हो

का भरते वीरभद्र प्रकट हुए भगवान शिव ने

उनको आदेश दिया कि काली को अपने संग लेकर

जाओ और उस यज्ञ भूमि को शमशान में बदल दो

जो सामने आए उसे मार डालो और उस उदंड

प्रजापति दक्ष का सर धड़ से अलग कर दो शिव

के आदेश को शिरोधार्य करके वीरभद्र और

काली ग क्षेत्र की ओर प्रस्थान करते हैं

तो बोलिए भक्तों माता शैल पुत्री की

[संगीत]

जय जब शिव को यह ज्ञात हुआ त्रिनेत्र है

खोला शिव के भयंकर क्रोध से सारा संसार है

डोला शिव ने अपनी एक जटा पत्थर पर पटक

दिया

जिससे अति बलशाली वीर भद्र ने जन्म

लिया शिव ने कहा है वीर भद्र काली को ले

लो संग दक्ष को देके दंड करो तुम यग को भी

भंग वीरभद्र और काली यज्ञ क्षेत्र को जाते

हैं पावन कथा सुनाते हैं हम शैलपुत्री

माता रानी की महिमा गाते हैं हम कथा

सुनाते हैं सबसे पावन तेरा नाम शर पुत्री

म तुम्हे प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम शर

पुत्री म तुम्हें

प्रणाम भक्तों नवरात्रि के प्रथम दिन मां

शैलपुत्री का पूजन किया जाता है पर्वतराज

हिमालय के घर देवी ने पुत्री के रूप में

जन्म लिया

और इसी कारण इनका नाम शैलपुत्री

पड़ा प्राकृतिक का प्रतीक मां शैलपुत्री

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता का

सर्वोच्च शिखर प्रदान करती है शैलपुत्री

के दाएं हाथ में त्रिशूल और बाए हाथ में

कमल का फूल रहता है तथा इनका वाहन वृषभ

यानी कि बैल है मां के इस रूप को लाल और

सफेद रंग की वस्तुएं पसंद होने के कारण इस

दिन लाल और सफेद पुष्प एवं सिंदूर अर्पित

करें और दूध की मिठाई का भोग लगाएं मां

शैलपुत्री का पूजन घर के सभी सदस्य के

रोगों को दूर करता है एवं घर से दरिद्रता

को मिटा संपन्नता को लाता है शैलपुत्री

माता का मंत्र है या देवी

सर्वभूतेषु प्राकृति रूपेण सस

नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः तो

बोलिए भक्तों माता शैलपुत्री की

[संगीत]

जय पर्वत राज हिमालय के घर फिर माता है आई

इसी कारण से प्रथम दुर्गा शैल पुत्र

कहलाई दाए हाथ में माता केशो पत रहता

त्रिशूल बाए हाथ में रहता सदा एक कमल का

फूल वृषभ है वाहन माता का सफेद लाल है

भाता माता का पूजन घर से दुख

[संगीत]

दारिद्रय नवाते हैं पावन कथा सुनाते हैं

हम शैल पुत्री माता रानी की महिमा गाते

हैं हम कथा सुनाते

हैं सबसे पावन तेरा नाम शर पुत्री मा

तुम्हे प्रणाम सबसे पावन तेरा नाम शरण

पुत्री म तुमहे

प्रणाम

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