बीजेपी पर भारी पड़े राहुल गाँधी/ BIG SPEECH SUPRIYA SRINATE ON CASTESIM

राहुल गांधी ने एक रिपोर्टर से ये पूछ
लिया कि तुम्हारी जात क्या है और तुम्हारे
मालिक की जात क्या है ये सवाल बिल्कुल
सटीक निशाने पर लगा है पर इस सवाल से
मीडिया के जो बड़े-बड़े मठाधीश हैं व बड़े

उत्तेजित आक्रोशित और विचलित नजर आ रहे
हैं और यह सच है कि संपादक और पत्रकार वो
अधिकांश सवर्ण वर्ग के थे आज भी 2024 में
एक भी संपादक मेन स्ट्रीम मीडिया का ना

एससी है ना एसटी है ना है जबकि उनकी
जनसंख्या 73 पर है तो उनका प्रतिभाग कहां
है उनका रिप्रेजेंटेशन कहां है टीवी

स्टूडियो में चका चौद में टाई पहनकर
आदिवासियों को वन में रहने की हिदायत देने
वाले लोग उनको कोयला चोर घोषित कर देने
वाले लोग यह बनेंगे शोषित दलितों वंचितों
आदिवासियों अल्पसंख्यकों की

आवाज राहुल गांधी ने एक रिपोर्टर से यह
पूछ लिया कि तुम्हारी जात क्या है और
तुम्हारे मालिक की जात क्या है यह सवाल
बिल्कुल सटीक निशाने पर लगा है पर इस सवाल
से मीडिया के जो बड़े-बड़े मठाधीश है वह
बड़े उत्तेजित आक्रोशित और विचलित नजर आ
रहे हैं टूट पड़े हैं राहुल गांधी पर

लेकिन यह सवाल जितना गंभीर और जितना गहरा
है और जितना वाजिब है उससे उत्पन्न
उत्तेजना उतनी ही सतही उतनी ही हल्की उतनी
ही सस्ती
है हमारे देश में पत्रकारिता का एक

गौरवशाली इतिहास रहा है जंगे आजादी के
दौरान आजादी के महा नायकों ने पत्रकारिता
के माध्यम से पिछड़ों का दलितों का
वंचितों का शोष का उनके खिलाफ हो रहे
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई गांधी जी ने तो

अपने अखबार का नाम ही हर्जन रखा था तब
पत्रकारिता व्यवसाय नहीं थी आजादी आई
पत्रकारिता का व्यवसायीकरण हुआ और यह सच
है कि संपादक और पत्रकार अधिकांश एक ही

वर्ग से आने लगे वो अधिकांश सवर्ण वर्ग के
थे और जो उनके मालिक थे वो अधिकांश वैश्य
थे उठाकर देख लीजिए किसी भी बड़े मीडिया
हाउस को आज भी 2024 में एक भी संपादक मेन

स्ट्रीम मीडिया का ना एससी है ना एसटी है
ना ओबीसी है जबकि उनकी जनसंख्या 73 पर है
तो उनका प्रतिभाग कहां है उनका
रिप्रेजेंटेशन कहां है यही सवाल तो राहुल
गांधी जी ने उठाने की कोशिश की है इसी

सवाल का तो जवाब वो आपसे मांग रहे हैं
बजाय इसका जवाब देने की कि इन लोगों का 73
पर का रिप्रेजेंटेशन कहां है राहुल गांधी
पर टूट पड़ना इसका जवाब नहीं है उस पर

बरगलाना इसका जवाब नहीं है और क्या यह
लोग उन लोगों की आवाज बन सकते हैं क्या ये
समझ सकते हैं उनकी पीड़ा टीवी स्टूडियो
में बैठ के ज्ञान देना बहुत आसान है चले
जाइए गांव देहात आज की तारीख में भी एक

ब्राह्मण और ठाकुर को बाबा और बाबू कहा
जाता है और कोई दलित पिछड़े वर्ग का आज भी
आपके सामने कुर्सी पर बैठने से अचकचा आता
है उसके लिए बेंच लगाई जाती है अलग बर्तन
में खाना दिया जाता है क्या ये उन दलितों
की आवाज बन सकते हैं जो दलित बस्ती तक

सीमित है क्या ये उस दर्द को समझ सकते
हैं टीवी स्टूडियो में चका चौद में टाई
पहनकर
आदिवासियों को वन में रहने की हिदायत देने

वाले लोग उनको कोयला चोर घोषित कर देने
वाले लोग ये बनेंगे शोषित दलितों वंचितों
आदिवासियों अल्पसंख्यकों की आवाज नहीं बन
सकते लेकिन असलियत यह है और यह असलियत बया
करनी जरूरी है कि राहुल गांधी ने जब मुख्य
धारा के मीडिया से सवाल पूछा तो उनकी

बेचैनी स्वाभाविक है पिछले 10 साल से
मीडिया जो है वह अपना कर्तव्य भूल चुका है
सवाल नहीं पूछता उनकी जो विश्वसनीयता है
वह शून्य पर है तो राहुल गांधी जी जब
धराशाई लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के मलबे पर
खड़े होकर दहाड़ हैं कि तुम रे इस पूरे

माया जाल में आम जन की आवाज कहां है तो यह
बेचैनी स्वाभाविक है यह बेचैनी स्वाभाविक
है और एक डर भी है डर इस बात का है कि
चाहे वह दलित शोषित वंचित आदिवासी
अल्पसंख्यक पिछड़े वर्ग के लोग हो जो 73

पर है चाहे व गरीब हो अभिजात वर्ग के वो
इनसे सवाल पूछेंगे कि बेरोजगारी के सवाल
कहां है महंगाई के सवाल कहां है आर्थिक
असमानता के सवाल कहां है क्यों पर्चे लीक
हो रहे हैं क्यों हमारे बच्चे बेरोजगार

घूम रहे हैं इनको डर है कि अगर उन्होंने
अपने मुद्दों पर वैकल्पिक मीडिया को ढूंढ

लिया तो इनके प्रचार प्रसार का क्या होगा
इनके कारोबार का क्या होगा इसीलिए राहुल
गांधी जी का जो सवाल है वो सटीक है
क्योंकि सामाजिक चेतना से ही सामाजिक
न्याय आएगा और न्याय तो आकर रहेगा आप
कितने भी आक्रोशित हो जाइए लेकिन उस झूठे

आक्रोश उस झूठी उत्तेजना उस टेबल पटकने
में एक सवाल का जवाब देते जाइएगा आपकी टीम
में
कितने दलित कितने पिछड़े और कितने आदिवासी
हैं नेशनल दस्तक की आपसे गुजारिश है कि

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