Article 370 पर सरकारी झूठ का ज़बर्दस्त भंडाफोड़

जानते हैं कि हमारे पास एक ऐसी सरकार है
और एक ऐसा आईटी सेल है जो वर्तमान से
ज्यादा इतिहास की बात करता है आप बात
करेंगे रोजगार क्यों नहीं है वो कहेंगे कि

नेहरू जी ने 370 क्यों लगाई थी आप पूछेंगे
कि देश में गरीबी बढ़ रही है तो वो कहेंगे
1942 में फलाना क्यों हुआ था तो दरअसल
पहली बात तो यह कि दुनिया का इतिहास बताता
है और आम नॉलेज भी हमको बताता है कि जो

पीछे देखकर चलता है हमेशा उसका एक्सीडेंट
होता है जब ड्राइव करना होता है तो हमेशा
हमें सामने देखना होता है तो हमारे पास एक
ऐसी सरकार है जो लगातार पीछे देख के

ड्राइव कर रही है और दिक्कत यह है कि उसका
एक्सीडेंट हो तो हमें कोई संकट नहीं है
चकि वो देश चला रही है तो देश का

एक्सीडेंट होने का खतरा है इसलिए हमें
बार-बार बोलना बहुत जरूरी हो जाता है
दूसरी बात यह होती है कि इतिहास में
बार-बार कौन मुंह छुपाता है जिसके पास
अपना इतिहास नहीं होता एक बहुत साधारण सी
मैं आपसे बात करूं कि मान लीजिए आप अच्छी

खासी पढ़ाई करके आए हैं कोई नौकरी कर रहे
हैं या राज नीति कर रहे हैं तो कोई आपसे
पूछेगा आपने कहां पढ़ा तो आप बता देंगे कि
फला कॉलेज में मैंने पढ़ाई की फला डिग्री

ली लेकिन अगर आपने बिना पढ़े लिखे जालसाजी
से एनटायर पॉलिटिकल साइंस की डिग्री ले ली
है तो फिर अगर आपसे कोई पूछेगा तो आप
कहेंगे कि डिग्री नहीं दिखाएंगे इतिहास के
साथ भी यही चीज है कि जब आपके पास अपना
कोई इतिहास नहीं होता है या आपके इतिहास

में काला धब्बा होता है तो जो रोशन चमकते
हुए सितारे हैं आप बार-बार उनके ऊपर कालिख
लगाने की कोशिश करते हो 370 प बोलने को
कहा गया मुझे मैं 370 पर आऊंगा लेकिन सबसे
पहले जो मेरा सबसे प्रिय विषय है गांधी और
नेहरू मैं 10 मिनट उस पर बात करने के बाद

और फिर 370 पर आना पसंद
करूंगा अब आप देखिए यहां से शुरुआत करते
हैं कि यह लोग सबसे बड़ी जो बात करते हैं
वह गांधी नेहरू पटेल और सुभाष के बीच में
तलवारें चलाने का काम करते हैं और कई बार

हम उलझ जाते हैं एक सीधा सा मैं आपको जवाब
देता हूं अगर मान लीजिए यहां से आपको
दिल्ली जाना है इस जगह से तो तीन दोस्त
बैठे हैं एक दोस्त कहेगा बम्बे चलते हैं

बम्बे से फ्लाइट ले लेंगे एक दोस्त कहेगा
चलो पुणे चलते हैं पुणे से फ्लाइट ले
लेंगे और तीसरा दोस्त हो सकता है कहे यार
इतनी अच्छी गाड़ी है ड्राइव करके चलते हैं
तीनों की मंजिल एक है दिल्ली इसलिए उनके
बीच में मतभेद है रास्तों को लेकर लेकिन
अगर किसी को दिल्ली जाना ही नहीं है अगर

किसी को यहां से या तो जाना नहीं है या
साउथ जाना है तो उससे जो मतभेद होगा वो
मतभेद नहीं होगा वो मनभेद होगा तो आप अगर
देखते हैं सुभाष बाबू हो चाहे सरदार पटेल
हो चाहे महात्मा गांधी हो चाहे नेहरू हो

उनके सामने दो सवाल थे इस चीज को समझने से
आधी बातें समझ में आ जाती है पहला सवाल यह
था कि देश आजाद कैसा होगा और उतना ही बड़ा
सवाल यह था कि देश आजाद होने के बाद कैसा
देश होगा यह सवाल था अब जिन लोगों ने यह

सपना देखा यह ख्वाब देखा कि कि देश आजाद
होने के बाद एक ऐसा डेमोक्रेटिक देश होगा
जहां सबको सारे अधिकार मिलेंगे जहां सब
मिलजुल के रहेंगे और हर व्यक्ति को एक
नागरिक का सम्मान वन पर्सन वन वोट की जब
बात होती है आप देखिए यूरोप में लंबी
लड़ाई चली इस बात के लिए कि महिलाओं को
वोट का अधिकार दिया जाए गरीबों को वोट का

अधिकार दिया जाए लेकिन हिंदुस्तान में
1947 में आपको आजादी मिलती है 48 में
संविधान लागू होता है और आपको हर व्यक्ति
को हिंदुस्तान के हर नागरिक को चाहे वह
किसी मजहब का हो चाहे किसी जेंडर का हो
चाहे उसके पास जमीन हो या ना हो अधिकार

दिया जाता है वोट देने का इसका मतलब यह था
कि उनका तसव्वुर यह था कि इस तरह का
हिंदुस्तान बने जहां हर आदमी एक तरह का रह
पाए ये इसी को हम लोग कहते हैं आइडिया ऑफ
इंडिया यह आइडिया ऑफ इंडिया की लंबी लड़ाई

थी इस आइडिया ऑफ इंडिया को दो हिस्सों में
आप बांट सकते हैं एक हिस्सा जो हिंदू
मुस्लिम सबकी एक एकता चाहता था और दूसरा

हिस्सा जो यह नहीं चाहता था इसीलिए एक तरफ
आपकी आती है कांग्रेस या फिर सरदार भगत
सिंह या बाकी सारे लोग जितने लोग देश की
आजादी के लिए लड़ रहे थे एक नाम आपको ऐसा
नहीं मिलेगा जो हिंदू मुस्लिम एकता की बात

नहीं कर रहा था चूंकि मैं महाराष्ट्र की
धरती पर हूं तो मैं सबसे पहले लोकमान्य
तिलक का नाम लूंगा 1916 में लखनऊ में एक
कान्फ्रेंस हुई जिसमें मुस्लिम लीग और
कांग्रेस दोनों शामिल होते कांग्रेस को
लीड गांधी तब नहीं कर रहे थे लोकमान्य
तिलक कर रहे थे और लोकमान्य तिलक ने वहां

पर मुस्लिम लीग से समझौता किया और यह लखनऊ
पैक्ट कहते हैं उसको यह पहला हिंदू
मुस्लिम समझौता पॉलिटिकल लेवल पर भारत में
था जब वह समझौता कर रहे थे तो हिंदू
महासभा के लोग कह रहे थे कि वह गलत कर रहे
हैं तो लोकमान्य तिलक ने एक बात कही थी

तिलक ने कहा कि अगर हमारी लड़ाई अंग्रेजों
से सीधी होगी यानी एक तरफ हिंदू मुसलमान
और सामने अंग्रेज तब तो हम इस लड़ाई को
जीत पाएंगे लेकिन अगर यह तिकोनी हो जाएगी

एक तरफ मुसलमान एक तरफ हिंदू और एक तरफ
अंग्रेज तो हम कभी नहीं जीत पाएंगे मजेदार
बात यह है कि आज जो लोग लोकमान्य तिलक की
बात करते हैं उनका नाम लेते हैं और कहते
हैं हम उनकी परंपरा के हैं वो लोकमान्य
तिलक की ये छोटी सी बात भूल जाते हैं इसके
बाद आप ले लीजिए हिंदू महासभा और मुस्लिम

लीग दोनों क्या कर रहे थे मूलता दोनों
बेसिकली आजादी की लड़ाई के बीच में इस तरह
से हस्तक्षेप कर रहे थे जिससे अंग्रेजों
को फायदा पहुंचे 1942 से बड़ा एग्जांपल

आपको नहीं मिलेगा मैं अभी एक पलेस्टाइन के
एक्सपर्ट से बात कर रहा था लंबी बात हुई
है उनसे मेरी तो उन्होंने कहा कि दुनिया

में कोई ऐसा एग्जांपल नहीं है जहां अहिंसा
से आजादी मिली हो तो मैंने कहा गांधी का
एग्जांपल तो है तो उन्होंने कहा गांधी
किसी और मुल्क में पैदा हुए ही नहीं किसी
और मुल्क में पैदा हुए होते तो शायद वहां

अहिंसा से आजादी मिल पाती यह बात मैं
क्यों कह रहा हूं 1942 में जब गांधी नेने
कहा अंग्रेजों भारत छोड़ो क्विट इंडिया का
नारा दिया तो उस समय केवल दो बड़ी

पार्टियां ऐसी थी जो क्विट इंडिया के नारे
का विरोध कर रही थी एक तरफ मुस्लिम लीग और
दूसरी तरफ हिंदू महासभा अब सोच के देखिए
ये क्यों विरोध कर रहे थे बाद में

कम्युनिस्ट लोग भी विरोध में उतरे क्यों
उतरे वो सब आप लोग जानते हैं रशिया के
शामिल होने के बाद लेकिन ये लोग शुरू से

विरोध कर रहे थे जिस समय 1942 में पूरा
हिंदुस्तान सड़क पर था अगर कोई दो संगठन
थे जिनका एक भी आदमी गिरफ्तार नहीं हुआ था
तो व हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग थे और
उसी समय सिंध में सरकार बनी कांग्रेस की

सारी सरकारें भंग कर दी गई सिंध में
मुस्लिम लीग को सरकार बनानी थी तो समर्थन
कौन देता हिंदू महासभा ने समर्थन दिया चलो
समर्थन दे दिया उससे भी मुझे कोई दिक्कत
नहीं आजकल कोई भी किसी को समर्थन दे देता

है लेकिन वहां सिंध की असेंबली में एक
प्रस्ताव पास हुआ जो ये लोग कहते ना
बंटवारे के लिए जिम्मेदार कौन है सिंध की
असेंबली में भारत के बंटवारे का प्रस्ताव
पास हुआ पाकिस्तान प्रपोजल सबसे पहले अगर
किसी असेंबली में पास हुआ है तो वह सिंध

की असेंबली है और वहां रूलिंग पार्टी थी
मुस्लिम लीग उसको सहयोग कर रही थी हिंदू
महासभा और बाकी सब छोड़िए यह लोग असेंबली
छोड़ के बाहर भी नहीं निकले विरोध करना तो
बहुत दूर की बात है चुपचाप असेंबली में

अपने सीट पर बैठे रहे जब भारत विभाजन का
प्रस्ताव पास हो रहा था नंबर एक नंबर दो
सावरकर और जिना दोनों लोगों ने हिंदू
महासभा के अध्यक्ष थे इसलिए मैं उनका नाम
ले रहा हूं हिंदू महासभा का रिप्रेजेंट

करते हैं वो दोनों लोगों ने यह प्रपोजल
दिया था कि अंग्रेज यहां पर रहे दो
डोमिनियन स्टेटस बन जाए एक हिंदू डोमिनियन
स्टेटस और एक मुस्लिम डोमिनियन स्टेटस
हिंदू महासभा को हिंदू डोमिनियन स्टेटस दे
दिया जाए और मुस्लिम लीग को दे दिया जाए
मुस्लिम डोमिनियन स्टेटस यानी अंग्रेजों
की सरपरस्ती में दो हिंदुस्तान यहां पर

रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने
आजादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया
था जो बंगाल में मंत्री थे और अंग्रेजों

को यह सलाह दे रहे थे कि 1942 में
कांग्रेसियों को किस तरह से बर्बाद किया
जाए दमन किया जाए उनको भी मिनिस्टर
बनाया क्या थी निगाह यह थी कि पहले की
बातें सब खत्म हो गई अब हम आजाद हो गए

हैं
हम सब मिलजुल के चले लेकिन इन्होंने क्या
किया इन्होंने गांधी को मार दिया और उसके
बाद कश्मीर का मसला मसला है कश्मीर लगातार
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही उठाना शुरू करते
हैं लगातार उठाते रहे क्योंकि गांधी हत्या
के बाद हिंदुस्तान में इनका कोई सुनने

 

वाला नहीं रह गया पूरा कश्मीर का मसला
क्या है मैं बहुत शर्ट में समझाने की आपको
कोशिश करूंगा पूरी पिक्चर आपके सामने मैं
रख देता हूं 19 15 अगस्त 1947 पर आप ले
चलिए 15 अगस्त 1947 के पहले हिंदुस्तान दो
तरह का था एक हिंदुस्तान जिस पर अंग्रेज
डायरेक्ट रूल करते थे और एक जहां राजे

रजवाड़े सुल्तान निजाम यह सारे लोग होते
थेय आप लोग जानते हैं महाराष्ट्र में कई
सारे राज रजवाड़े थे जतर राजे रजवाड़े
आजाद रहने की बात कर रहे थे लेकिन उनको
समझा दिया गया था कि कागज पर आजाद रहने की

आजादी आपको है लेकिन इतने बड़े दो मुल्कों
के बीच में कहीं आप आजाद नहीं रह सकते तो
ज्यादातर दे रजवाड़ों ने यह फैसला किया कि
वोह हिंदुस्तान से मिल जाएंगे या
पाकिस्तान से मिल जाएंगे उसमें जोग्राफी
का भी मामला था जो पाकिस्तान के नक्शे के
अंदर आ रहे थे उनको पाकिस्तान से कई बार

ना चाहते हुए मिलना पड़ा कई सारे ऐसे
रजवाड़े थे जो मुस्लिम रजवाड़े थे लेकिन
हिंदुस्तान से मिलना चाहते थे थे लेकिन वह
पाकिस्तान के भीतर पड़ रहे थे इसलिए वो

नहीं मिल पाए कश्मीर की जो स्थिति थी व
ऐसी थी कि जितना वह पाकिस्तान के नजदीक था
उतना ही हिंदुस्तान के नजदीक था आप उस तरफ
चले जाइए रावलपिंडी आ जाएगा इस तरफ चले
जाइए जम्मू आ जाएगा यानी वो एक ऐसी

जियोग्राफिक कंडीशन में था जिसमें
हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों के बीच में
नहीं पड़ रहा था नंबर एक नंबर दो उसके जो
राजा थे महाराजा हरि सिंह वो ना
हिंदुस्तान में मिलना चाह रहे थे ना

पाकिस्तान में मिलना चाह रहे माउंट बेटन
बाकायदा गए थे उनको मनाने के लिए कि भाई
तय करो और मैं आपको बताऊं कि माउंट बेटन
यह कहने गए थे बाद में निकल के आया कि तुम
पाकिस्तान के साथ मिल जाओ ठीक है लेकिन
हरि सिंह उनसे नहीं मिले जो लोग

हिंदुस्तान के साथ मिल जाओ कहने गए उनसे
भी हरि सिंह नहीं मिले हरि सिंह एक सपना
देख रहे थे डोगरी स्तान का और अब बाकायदा
पेपर्स है मेरे पास वो सारे पेपर मैंने
लंदन से हासिल कर लिए मेरे पास है बाकायदा

डोगरी स्तान का उन्होंने नक् बनाया जिसमें
लेह लद्दाख होना था जम्मू होना था कश्मीर
होना था और हिमांचल का थोड़ा एरिया होना
था उन्होंने कहा यह आजाद डोगरी स्तान

 

बनेगा यानी हिंदुस्तान पाकिस्तान और एक
डोगरी स्तान और आखिरी बात जिस बात को बहुत
कायदे से समझ लेना जरूरी है कि हिंदुस्तान

में पंडित जवाहरलाल नेहरू के अलावा कोई
नहीं था जो कश्मीर को हिंदुस्तान में
मिलाने के लिए बेताब था सरदार पटेल के जो
सेक्रेटरी है उनकी किताब बेहद फेमस है इस
इ स्टेट को कैसे मिलाया गया उसमें बहुत
डिटेल में बताते हैं और उसमें एक जगह
लिखते हैं कि हमारे पास पहले से इतना कुछ
था कि कश्मीर के बारे में हमें सोचने की
फुर्सत ही नहीं थी यानी वह मान के चल रहे

थे कि चकि मुस्लिम बहुल इलाका है तो व
पाकिस्तान में आज नहीं तो कल शामिल हो
जाएगा कोई दिक्कत नहीं है सरदार पटेल का
भी लिखा उपलब्ध है और उस समय हिंदू महासभा
सरदार पटेल के इस स्टैंड के साथ खड़ी थी

उसका यह मानना था कि कश्मीर को हिंदुस्तान
में मिलाने की कोई जरूरत नहीं है जम्मू को
मिला लिया जाए और जो मुस्लिम बहुल इलाका
है उसको पाकिस्तान में मिला दिया जाए सबके
रिकॉर्ड्स है अब 10 साल पहले भले नहीं रहे
होंगे लेकिन 10 साल में हम लोगों ने जो

रिसर्च किए हैं सबके कागजात बाकायदा
उपलब्ध है मैंने अपनी किताब में भी दिया
है दसियों बार उसके वीडियो भी दिखाए अब यह
हालात मैंने आपको यह मंजर बता दिया कश्मीर

के अंदर सिर्फ एक नेता था जो हिंदुस्तान
से मिलने की बात करता था और उसका नाम था
शेख अब्दुल्ला उसकी वजह थी उस वजह को
समझना बहुत जरूरी है कांग्रेस का स्टैंड
ये था कि राजे रजवाड़ों के अंदर हम काम
नहीं करेंगे हम केवल जो डायरेक्ट रूल है

उस परे काम करेंगे नेहरू जी ने पहली बार
स्टेट पीपल्स कांग्रेस बनाई और स्टेट
पीपल्स कांग्रेस खास तौर पर उन्हीं जगहों
के लिए थी जहां राजे रजवाड़े थे शेख
अब्दुल्ला उस स्टेट पीपल्स कॉन्फ्रेंस में

शामिल होते हैं लगातार नेहरू के साथ उनके
संबंध रहते हैं और शेख अब्दुल्ला की जिद्द
थी कि कश्मीर जब आजाद हो तो पिछले 400
सालों से वहां जो जमीन का अधिकार है वह
किसानों के पास नहीं है किसानों को उनकी

जमीन मिले और जमीन की चकबंदी अब आप लोग
क्या कहते हैं यहां की भाषा में मैं नहीं
जानता अलग-अलग टुकड़े जो लैंड के होते हैं
वो एक साथ जो मिला दिए जाते हैं
कंसोलिडेशन जिसको कहते हैं अंग्रेजी में

वो चकबंदी हो यहां पर जमीन की सीमा बा दी
जाए और कांग्रेस के उसमें हमेशा से था कि
किसानों के हित की नीतियां बनेंगी जबकि

पाकिस्तान में जमींदारों को जो वहां के
बड़े जमीदार पंजाब के थे उनकी पार्टी हुआ
करती थी मुस्लिम लीग तो शेख अब्दुल्ला 15
अगस्त 19 197 को जेल में थे यह मैंने मैं
आपके सामने मंजर रख दिया 15 अगस्त 1947 को

जिस समय नेहरू जी संसद में भाषण दे रहे थे
तीन मुल्क एक साथ आजाद हुए थे कश्मीर यानी
जम्मू और कश्मीर हिंदुस्तान और पाकिस्तान
तो पहली बात तो यह कि 15 अगस्त 1947 को
जम्मू और कश्मीर एक आजाद मुल्क था अब जिना

साहब जो हैं वो कतई बर्दाश्त नहीं कर पाते
थे कह रहे कहते थे कश्मीर मेरी शाह रग है
ऐसी रग है शाह रग जिसके बिना वो जी नहीं
सकता पाकिस्तान कभी सांस नहीं ले सकता और
कई सारे लोग यह कहते थे कि बांग्लादेश

वाले इलाके से बेहतर होता कि हमको कश्मीर
मिल
जाता तो पाकिस्तान की सेना ने वहां कबाइली
हों को भेजना शुरू किया कबाइली आ गए थे
पीछे से पूरा सपोर्ट मैंने अपनी किताब में
दिया है कि पाकिस्तान का यह दावा पूरी तरह

से झूठा है कि केवल कबाइली थे आर्मी नहीं
थी आर्मी ने भेजा सबसे पहले इस बात की खबर
जवाहरलाल नेहरू को लगी और जवाहरलाल नेहरू
ने सरदार पटेल को खत लिखा और वह खत आराम
से कोई भी पढ़ सकता है नेहरू नेहरू पटेल
कोस्पेसस में वह खत है जिसमें उन्होंने

सरदार पटेल से कहा कि पाकिस्तान कश्मीर के
ऊपर हमला कर सकता है तो पहली बात तो यह कि
सबसे बड़ा झूठ यह है कि नेहरू जी ने बाकी
सारे स्टेट तो पटेल कर रहे थे कश्मीर को
अपने हाथ में रखा नहीं वो डायरेक्ट कोई

एक्शन नहीं लेते हैं सरदार पटेल को खत
लिखते हैं कि कश्मीर के ऊपर पाकिस्तान
आक्रमण कर रहा है अब सरदार पटेल भी क्या
कर लेते आज अगर बांग्लादेश के ऊपर कोई
आक्रमण कर रहा हो तो हम जाकर वहां पर
हस्तक्षेप कर सकते हैं जब तक बांग्लादेश
गवर्नमेंट हमसे सहायता नहीं मांगे नहीं कर
सकते हैं ना तो जम्मू कश्मीर आजाद मुल्क

था जिसके ऊपर पाकिस्तान आक्रमण कर रहा था
राजा ने हमसे कोई सहायता मांगी नहीं थी तो
हम वहां पहले आर्मी नहीं भेज सकते थे ना
सरदार पटेल इसके लिए राजी थे ना माउंट बटन
राजी थे और नेहरू भी नहीं राजी थे इसके
बाद सेना पहुंचाई बिल्कुल बारा मुला तक जो

लोग कश्मीर गए होंगे नॉर्दन कश्मीर में
बारा मुला है एकदम बारा मुला तक सेना
पहुंचाई और लाइट काट दी तकदीर अच्छी थी कि
दो दिन बाद ईद थी तो उन लोगों ने फैसला
किया कि अब तो श्रीनगर हाथ में है ईद मना
ले उसके बाद आगे बढ़ेंगे और तब महाराजा को

समझ में आया कि अगर दो दिन और लेट हो गया
तो श्रीनगर उनके हाथ में मिल जाएगा हम लोग
सारे लोग मारे जाएंगे तब उन्होंने
हिंदुस्तान से कहा मदद कीजिए अब लेमा
समझिए आप एक आजाद मुल्क पर दूसरा आजाद
मुल्क आक्रमण कर रहा है आप कैसे मदद

करेंगे आप बिना किसी लीगल प्रोविजन के
कैसे मदद करेंगे तो नेहरू ने शर्त रखी कि
पहले आप हमारे साथ विलय कीजिए जब विलय हो
जाएगा उसके बाद हम आपके आपके पास सेना भेज
सकेंगे क्योंकि तब वो हिंदुस्तान का

हिस्सा बन जाएगा उसके बाद भाग के गए विलय
हुआ 26 तारीख को और उसी दिन रात को सेना
पहुंची एक और झूठ वो लोग बोलते हैं कि
सेना भेजने में एक दिन का लेट हुआ 11 बजे
दिन में विलय के कागज पर सिग्नेचर होते

हैं और शाम को 5:00 बजे यहां से सेना निकल
जाती है शेख अब्दुल्ला को रिहा किया जाता
है जब वहां हमारी आर्मी पहुंचती है डकोटा
प्लेन से तो लाइट नहीं थी 1000 के आसपास

टार्च लेके शेख अब्दुल्ला और कांग्रेस के
लोग और नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोग वहां प
इकट्ठा हुए थे 1000 टर्ज की रोशनी में
हमारी सेना वहां पे उतरी थी और उसके बाद
शुरू होती है लड़ाई अब आप देखिए जो लेटर

ऑफ एक्सेशन बना था सारे राज्यों के लिए
बना था उसमें बहुत साफ लिखा था कि हम
सिर्फ तीन मामलात ऐसे होंगे जिसमें
हिंदुस्तान के साथ मिलेंगे एक विदेशी

और
टेलीफोन का मामला बाकी के साथ यह हुआ कि
15 अगस्त तक आते-आते उन्होंने पूरे के
पूरे संविधान को स्वीकार कर लिया यहां तो
काम ही शुरू हुआ 26 अक्टूबर से और शुरू
हुआ लड़ाई के बीच में तो कागज साइन हो गए
लड़ाई चलती रही अब आप कहते हैं कि कि

नेहरू जी ने लड़ाई रुकवा दी अदर वाइज हम
पूरा पाकिस्तान जीत सकते थे देखिए सबको
अपने लड़के पर बड़ा गर्व होता है और सबको
अपनी आर्मी पर बहुत गर्व होता है लेकिन
सोच के देखिए दिसंबर में कश्मीर आप लोगों
में से जो लोग गए होंगे मैं तो महीनों
महीनों वहां चिल्ला कला में रहा हूं मतलब

हालत ये होती है कि अगर रात को आधे घंटे
लाइट चली जाए तो जान निकल जाती है अगर
हीटर बंद हो जाए तो दिसंबर में हमारी सेना
वहां लड़ रही थी और सेना के ज्यादातर लोग
ऐसी जगहों के थे जो ठंडे इलाके नहीं थे
वहां लड़ने के लिए इक्विप नहीं थी दिसंबर
में युद्ध बंदी हुई है वहां युद्ध रुका है

नवंबर में सरदार पटेल का फिर एक लेटर है
जिसमें सरदार पटेल व मैंने र पर कई बार
लगाया लेटर सरदार पटेल लिखते हैं कि अगर
यह लड़ाई और लंबी चली तो हमारा खजाना पूरी
तरह से खाली हो जाएगा और जीत की कोई

संभावना मुझे नजर नहीं आ रही है यह सरदार
पटेल लिखते हैं नेहरू नहीं लिखते इसीलिए
दिसंबर में अपना मैक्सिमम इलाका हम जीत
चुके थे कश्मीर की पूरी वैली जीत चुके थे

जम्मू खाली करा लिया था जम्मू के आसपास का
पुंछ का आधा से अधिक इलाका हमने खाली करा
लिया था कारगिल पर हमारा कब्जा हो गया था
ये सारे इलाके हो गए थे तो यह हुआ कि
युद्ध विराम किया
जाए अब एक सवाल होता है कि नेहरू जी यूएन

में क्यों चले गए कोई मुझे बताए आपके
पड़ोसी से आपका झगड़ा हो जाए जमीन की
लड़ाई हो जाए तो आप कहां जाएंगे कोर्ट में
जाएंगे दुनिया का कोर्ट कौन है यूएन है
फलस्तीन इजराइल में लड़ाई चल रही है तो
साउथ अफ्रीका कहां गया इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ
जस्टिस में ही गया

तो अगर हिंदुस्तान पाकिस्तान की लड़ाई चल
रही थी देखिए सपना देखना बड़ा आसान है कि
हम अपनी सेना से कहते व पूरी पाकिस्तान को
कब्जा कर लेता 10 साल से हैं आप शासन में

ना एक बिता जमीन कहीं की कब्जा करके दिखा
देते अगर आपको इतना ज्यादा अहंकार है तो
कहीं की बांग्लादेश की भूटान की नेपाल की
कहीं की नेपाल तक ने तो हमारी जमीन क

ब्जा
करके रखी हुई है आपकी हिम्मत नहीं होती है
बोलने की मालदीव जैसा देश जो मेरी सोसाइटी
से थोड़ा सा बड़ा है दिल्ली में जिस इलाके

में मैं रहता हूं मेरी ली से थोड़ा सा
बड़ा उसका इलाका है और पापुलेशन दिल्ली की
आधी भी नहीं है वह आपसे कहता है कि 64 लोग
जो आपकी आर्मी के हैं उसको आप हटा लीजिए
और आप वो खबर अपने अखबार में नहीं छपने

देते हैं और चुपचाप मान लेते हैं कि हम
हटा देंगे लक्षद्वीप में जाकर नाटक कराते
हैं फोटो खिंचा आते हैं और बहिष्कार

बहिष्कार होता है लक्षदीप का वहां का क्या
कहते हैं मालदीव का उससे उसको कोई फर्क
नहीं पड़ता है चाइना ज्यादा टूरिस्ट वहां
पर भेज रहा है और अब कंडीशन ये है कि
श्रीलंका को आपने बड़ी मुश्किल से रोका था
कि हम स्पाई सेंटर चाइना अपने यहां मत

बनने दो मालदीव ने चाइना को जमीन दे दी
अपना स्पाई सेंटर बनाने के लिए तो मालदीव
जैसी छोटी सी कंट्री जहां राजीव गांधी ने

24 घंटे के अंदर आर्मी भेजकर मालदीव को
बचा लिया था और मालदीव ऐसा एहसान मानता था
कि वहां का राष्ट्रपति जब चुना जाता था तो
सबसे पहले दिल्ली आता था दिल्ली में सलामी
पेश करने के बाद वोह दुनिया के किसी मुल्क

में जाता था उसको तो आप संभाल नहीं पा रहे
हैं संसद में चिल्लाते हैं पीओके ले लेंगे
ले लो यार बेहद खूबसूरत जगह है पीओके मैं
तो घूमना चाहता हूं ले लो कम से कम आप

अपने 10 साल में तो आपने एक बित्ता जमीन
भी कहीं नहीं ली और आप 1947 48 में जब
हमारा मुल्क नया नया आजाद हुआ था जब ना
हमारे पास पैसे थे ना मॉडर्न हथियार थे
मैं आपको बता रहा हूं कि सेना का जो पहला
विमान पहुंचा था वो डकोटा विमान था जिसमें
यात्री चलते थे आर्मी के पास अपने

एयर एरोप्लेंस तक नहीं थे उस समय आप
उम्मीद करते हैं कि दिसंबर की ठंड में
पूरा पाकिस्तान आप कब्जा कर
लेते बातें करना बहुत आसान होता है आर्मी
पर हम सबको गुरूर है हम में से किसी के घर
का बच्चा अगर आर्मी में होता है तो हम
गुरूर से भर जाते हैं लेकिन यह भी जानते
हैं कि बच्चा ही है और पाकिस्तान में भी
कोई ऐसा नहीं है कि वहां भी बच्चे ही
होंगे लड़ाई होगी जब तो इधर से भी मारे
जाएंगे उधर से भी मारे जाएंगे तो एक सलूशन
निकाला गया कि एक लाइन ऑफ कंट्रोल बनाया
जाए और यूएन में मामला जाए अब यूएन से
भारत को नुकसान क्या हुआ भारत जनमत संग्रह
के लिए तैयार था वहां पर अब जनमत संग्रह
की बात क्यों आई क्योंकि यह पॉलिसी बनी थी
कि जहां राजा का धर्म और प्रजा का धर्म
अलग-अलग होगा जनता का वहां जनमत संग्रह
होगा और जनमत संग्रह का पहला फायदा
जूनागढ़ में मिला था आपके बगल में है
जूनागढ़ में तो के दादाजी उस जमाने में
दीवान हुआ करते थे और वह पाकिस्तान से
मिलने के लिए बेताब थे पटेल और नेहरू ने
मिलकर पहले शिकंजा कसा और उसके बाद
बाकायदा वहां पर रेफरेंडम कराया रेफरेंडम
में 92 वोट्स मिले पाकिस्तान को बाकी सारे
के सारे वोट हिंदुस्तान को मिले यूएन में
दिखाया कि देखिए ये रेफरेंडम हमारे साथ है
और जूनागढ़ हमारा हिस्सा बना तो कश्मीर
में भी रेफरेंडम के लिए नेहरू तैयार थे
पाकिस्तान शुरुआती दौर में तैयार नहीं था
क्योंकि जानता था कि शेख अब्दुल्ला जिधर
खड़ा हो जाएगा कश्मीर की जनता उधर ही जाकर
खड़ी हो जाएगी और हम रेफरेंडम में हार
जाएंगे मैंने सारे रिकॉर्ड दिए हैं कि
पाकिस्तान कैसे बार-बार बारबार पीछे हटता
रहा आप नेहरू की मोहब्बत देखिए अपने मुल्क
से कि जो शेख अब्दुल्ला उनको दिल से
ज्यादा पसंद थे जो उनके घर प आके रुकते थे
और सारा कुछ था जिस दिन उन्होंने शक हुआ
और मैं आज पब्लिकली कह रहा हूं कि मैं
मानता हूं कि वो गलत शक था नहीं करना
चाहिए था लेकिन जिस दिन शक हुआ कि वो
हिंदुस्तान के खिलाफ काम कर रहे हैं शेख
अब्दुल्ला को गिरफ्तार करने में भी एक
मिनट नहीं रुके जब उनको भरोसा हो गया कि
नहीं मेरी गलती थी उनको रिहा
किया तो अगर नेहरू नहीं होते तो कश्मीर
प्रॉब्लम नहीं होती यह मैं मानता हूं
लेकिन अगर नेहरू नहीं होते तो कश्मीर
हिंदुस्तान का हिस्सा ही नहीं होता तो अगर
आप यह चाहते हैं कि वो पाकिस्तान में रहता
तब तो आप बिल्कुल नेहरू की मुखालिफत कर
सकते हैं लेकिन अगर आपको लगता है कि नेहरू
की गलती थी तो आप गलतियां सुधार दीजिए अब
370 प एक बात करके मैं अपनी बात खत्म कर
दूं लेकिन उल्टा चलना कई बार मुझे पसंद है
आप में से कुछ लोग जरूर होंगे जो 370 हटने
के पहले कश्मीर गए होंगे और उसके बाद भी
कश्मीर गए होंगे मैं तो कम से कम सात या
आठ बार 370 हटने के पहले जा चुका हूं और
उसके बाद लगातार जाता ही रहता हूं क्या
फर्क आया है कश्मीर में कोई मुझे बता दे
से क्या फर्क आया है एक चीज जरूर हुई है
एयर टिकट बहुत महंगे हो गए हैं पहले हम
लोग 57000 का टिकट मिल जाता था अब दिल्ली
से 15000 से कम का टिकट नहीं मिलता है
बाकी आर्मी आपकी वैसी की वैसी है एफएस पीए
वैसे के वैसे लगा हुआ है आतंकवादी घटनाएं
वैसे के वैसे हो रही है एक इंडस्ट्री नहीं
बनी एक कश्मीरी पंडित लौट कर नहीं गया 10
साल हो गए इनके शासन के कश्मीरी पंडित
कश्मीरी पंडित चिल्लाते रहते हैं सैकड़ों
कश्मीरी पंडित जो वहां नौकरी कर रहे थे वो
वापस लौट के जम्मू आ गए क्योंकि पंडितों
के ऊपर पहली बार टारगेटेड हमला शुरू हुआ
इनके राज्य में एक कश्मीरी पंडित नहीं है
जिसको यह वापस लौटा पाए एक राज्य को दो
हिस्सों में बांट दिया और बांट के अब क्या
हो रहा है लेह में अलग प्रदर्शन हो रहा है
कि तुमने हमको धोखा दिया आप जानते हैं कि
लेह की जो लोकल यूनिट के लोकल इकाई का
इलेक्शन हुआ था मनिस पार्टी का उसमें
कांग्रेस ने जीता था जबकि पिछली बार एमपी
भी इनका था सब कुछ इनका था लेकिन उन्हीं
लोगों ने और जब मुसिपालिटी में ले की कह
रहा हूं तो तो अपने यहां का आमदार समझिए
उसको उसको कोई छोटी मोटी चीज मत समझिए
क्योंकि बहुत जरा सा इलाका है जितने वोटों
से एमपी चुने जाते हैं उससे थोड़े ही से
कम वोटों से वो चुने जाते हैं तो उसको
एमएलए आप समझिए वहां यह हरे लगातार जुलूस
निकल रहा है जम्मू में लगातार जुलूस निकल
रहे हैं कश्मीर में इलेक्शन कराने की इनकी
हिम्मत नहीं हो रही है इतना प्रचंड बहुमत
इनके पास है कि पिछले 19 से लेकर 24 आ गया
लेकिन इनकी इलेक्शन कराने की हिम्मत नहीं
है अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है तो पता
नहीं इलेक्शन करा पाएंगे कि नहीं करा
पाएंगे मिला क्या आपको पहला सवाल यह बाकी
जो पूरे हिंदुस्तान में लोग पागल हो गए
370 हट गया उनसे अब मेरा सवाल है आपको
क्या मिला जाकर जरा जमीन खरीद लीजिए पहला
सवाल तो मेरा यही है कि आप जमीन क्यों
खरीदेंगे जमीन कहां कोई खरीदता है या तो
इन्वेस्टमेंट के लिए खरीदता है या रहने के
लिए खरीदता है और वह घर के आसपास ही
खरीदता है कश्मीर में इन्वेस्टमेंट करने
की हिम्मत किसी की है अभी तक तो अडानी की
भी नहीं पड़ी बाकियों की तो छोड़ दीजिए
क्योंकि जब तक आप हालात सामान्य नहीं
करेंगे वहां कौन इन्वेस्टमेंट करेगा तो
कोई इवेस्टमेंट नहीं हुआ नया कोई कश्मीरी
पंडित जाकर नहीं बसा आपके हालात में कोई
फर्क नहीं आया कश्मीरियों के अंदर जो
गुस्सा पल रहा है वो कब कैसे निकलेगा यह
कोई नहीं जानता है तो पहली बात तो मिला
नहीं अब दूसरी बात 370 था क्या रेफरेंडम
नहीं हो पा रहा था और हिंदुस्तान कश्मीर
का कश्मीर हिंदुस्तान का हिस्सा बन चुका
था तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच में एक
समझौता हुआ जो लीगली जरूरी था वही समझौता
370 था बाकी स्टेट से अलग वो इसलिए था
क्योंकि बाकी स्टेट 15 अगस्त के पहले आपके
संविधान के साथ पूरी तरह से मिल चुके थे
कश्मीर ने कश्मीर में राजा ने अपनी जिद्द
के चलते चार छ महीने चीजों को लेट कर दिया
था और जंग के हालात चले आ गए थे आप यूएनओ
में चले यूएन में चले गए थे इसलिए आपको
370 बनाना पड़ा और 370 की पहली धारा क्या
है जिसको कोई नहीं हटा सकता कश्मीर जम्मू
और कश्मीर राज्य भारत का अविभाज्य हिस्सा
है जिसको अलग नहीं कि किया जा सकता जिस
जिस कानून में पहली धारा हो कि जम्मू और
कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा है व
जोड़ने वाला कानून है कि तोड़ने वाला
कानून है यह फैसला मैं आपके ऊपर छोड़ता
हूं उसके बाद मैं बताऊं मनमोहन सिंह के
जमाने में दिलीप पड़गांवकर के साथ दो और
लोगों को भेजा गया था कश्मीर इंटरलड्स को
उनकी रिपोर्ट आप चाहेंगे तो आपको गल
करेंगे आराम से मिल जाएगी उसमें उन्होंने
19 2000 के शुरुआती दौर में लिखा है कि अब
जम्मू और कश्मीर में शायद ही कोई ऐसा
कानून है जो बाकी हिंदुस्तान से अलग है
यानी धीरे-धीरे 370 में सुधार करके हम
उसको वहां ले आए थे कि भारत के कानून के
साथ सारा कुछ वो मिल गया था सीएजी का पावर
वहां चला गया था वहां के हाई कोर्ट का जज
दिल्ली से तय होता था सारी चीजें हो गई थी
और धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी क्या गड़बड़
हुई है वो मैं आपको बता देता हूं जो लोग
हिंदुस्तान का झंडा कश्मीर में उठाते थे
चाहे वो शेख अब्दुल्ला और उनकी फैमिली हो
चाहे मुफ्ती मोहम्मद सईद हो या बाकी सारे
लोग हो जितनी भी पार्टियां आप देख सकते
हैं जो भारत का झंडा उठाती थी उनके पास एक
मुद्दा था व कहते थे कि देखो कश्मीर के
लिए हम एक स्पेशल स्टेटस लेके आए हैं और
हिंदुस्तान ने हमको एक स्पेशल स्टेटस दिया
है इसलिए हिंदुस्तान से नाराजगी की वजह कम
होती थी आपने वो छीन लिया और जो लोग
हिंदुस्तान का झंडा नहीं उठाते थे वो आज
फारूक अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार को गाली
देते हैं कि तुमने इतने साल हिंदुस्तान का
झंडा उठाया बदले में क्या मिला तुम लोगों
को कैद करके हिंदुस्तान ने 370 हटा दिया
यह मिला है आपको पूरे देश में अभी कल ही
रिपोर्ट आई है और डिटेल रिपोर्ट आई है
हालाकि सबको पता था पुलवामा हमले को लेकर
जो सारी रिपोर्ट आई है आपने कहा पाकिस्तान
के अंदर घुस के मारा और अपने दो जहाज और
छह सैनिकों को आपने खत्म करवा दिया दो
जहाज आपके खत्म हुए छह सैनिक मारे गए और
एक सैनिक आपका 6 60 घंटे तक पाकिस्तान के
ऑक्यूपेशन में रहा और जो पाकिस्तान के
अंदर घुस के आपने मारा था उससे हिंदुस्तान
को मिला क्या सारी दुनिया ने यह कहा
बीबीसी से लेकर हर जगह पर आया कि वहां कोई
नुकसान नहीं हुआ है कुछ पेड़ गिरे हैं
वगैरह वगैरह चलो मान लेते हैं वहां नुकसान
हुआ भी उससे हमारा क्या फायदा हुआ हमको एक
इंच जमीन मिली किसी मुद्दे पर पाकिस्तान
हमसे डर रहा है या हमारे सामने पाकिस्तान
ने कोई बहुत दोस्ताना हाथ बढ़ाया आप तो
पहुंच गए थे शल लेकर आप तो बाकायदा पहुंच
गए थे नवाज शरीफ के बर्थडे पर बिना बुलाए
पड़ोसी के बर्थडे पर कोई बिना बुलाए नहीं
जाता है लेकिन आप नवाज शरीफ के यहां पहुंच
गए उनकी माता जी के लिए शाल लेके गए
शुरुआत यहां से की और अंत यहां से कर रहे
हैं कि पाकिस्तान पाकिस्तान पाकिस्तान
हमें वोट दो पाकिस्तान पाकिस्तान मुझे तो
लगता है कि अगर पाकिस्तान और मुसलमान नहीं
होते तो भारतीय जनता पार्टी वोट किस बात
पे मांगती आप कश्मीर की इतनी सारी बातें
करते हैं चलो कश्मीरी मुसलमानों को मैं
छोड़ देता हूं कश्मीरी पंडितों का कुछ तो
भला किया होता नेहरू तो 1964 में मर गए अब
दोबारा नहीं आने वाले इंदरा जी भी 84 में
गई अब नहीं आने वाली आपका तो राज है ना आप
हो 10 साल से आपका वो ये लोग क्या कहते
हैं दो इंजन कश्मीर में तो तीन इंजन की
गाड़ी है आपके पास राज्य आपका राज्यपाल है
वहां पर आपकी आर्मी है और आप हो इन तीन
इंजनों ने मिलकर अगर एक कश्मीरी पंडित को
यह लोग तीन इंजन मिलकर वापस नहीं ला पाए
तो इस सारे हल्ले का क्या मतलब है मैं
आपको एग्जांपल दे सकता हूं कि 2014 तक
कांग्रेस के शासन में 17 18 कश्मीरी
पंडितों की मेरे पास डिटेल है जो लौटकर
वहां गए थे और कुछ बातें जो लोग डिबेट में
जाते हैं वो लोग जरूर नोट करले इस बात को
कश्मीरी पंडितों के लिए जो घर बने वो
मनमोहन सिंह के सरकार में बने मनमोहन सिंह
ने वहां पर प्रधानमंत्री जो योजना लाई थी
उसमें उनके लिए घरों का प्रावजन किया था
और नौकरियों का प्रावजन किया था इसलिए
क्या हुआ था कि जम्मू में रह रहे बहुत
सारे लोगों को कश्मीर में बाकायदा नौकरी
दी गई थी प्लान यह था कि वोह जाकर पहले
रहेंगे दो-तीन साल नौकरी करेंगे और फिर
धीरे-धीरे वहां के समाज में घुलमिल जाएंगे
और ऐसा हुआ भी कम से कम तीन परिवारों को
मैं जानता हूं जो जम्मू से गए पहले कॉलोनी
में रहे और उसके बाद अपने पुराने गांव में
लौट गए और शांति से रह रहे हैं तो घर
बनवाए पेंशन दिया उनको राशन की सुविधा दी
ये सारा कुछ किया कांग्रेस के गवर्नमेंट
में और टू बीएच के बाकायदा दिया था इनके
टाइम में जो घर बना जो अभी पूरा भी ढंग से
नहीं हुआ है वो वन बीएच के है कुछ वैसा ही
घर है जो अडानी बना के देगा आपके धारावी
में कुछ उस टाइप के ही घर दे रहे हैं एक
कश्मीरी पंडित को वापस नहीं ले जा पाए और
जितने कश्मीरी पंडितों की हत्या इनके समय
में हुई है उतनी तो 2004 से 14 के बीच में
उसका 10 पर भी नहीं हुआ है एक कश्मीरी
पंडित नहीं मारा गया था तो आप नीति का
किसी भी नीति का फैसला तो इस बात से होगा
कि उसका परिणाम क्या हो रहा है आपने बहुत
अच्छी योजना बनाई कागज पर बहुत अच्छी लग
रही है संसद में आप बहुत चिल्लाए लेकिन
जमीन पर अगर वह काम नहीं कर रही है तो
योजना बेकार है तो कश्मीर की जो आज की
हकीकत है कि आप चुनाव करा नहीं पा रहे हैं
आतंकवाद आप रोक नहीं कर पा रहे हैं
कश्मीरी पंडितों को वापस ले नहीं जा पा
रहे हैं और दरअसल आप पॉलिसी पैरालिसिस
कहते रहे हैं कश्मीर में आप पॉलिसी
पैरालिसिस के इतने बड़े शिकार हैं कि
अडानी भी अभी तक वहां पर इन्वेस्टमेंट
करने को तैयार नहीं है जो शायद चांद प भी
इन्वेस्टमेंट करने को तैयार हो जाए लेकिन
अभी तक कश्मीर में अडानी ने भी एक रुप का
इन्वेस्टमेंट नहीं किया झूठ बोलना आसान
काम होता है सच बोलना मुश्किल काम होता है
क्योंकि सच को हमेशा तर्क देना पड़ता है
सच को
हमेशा किसी सहारे बोलना होता है जब हम
किताब लिखते हैं तो हमें घंटो लाइब्रेरी
खंगाल नहीं पड़ती है जब कोई
हो आप उसका चेहरा देखिए इसलिए आप जब भी इन
लोगों से किसी बहस में उतरते हैं तो पहली
बात कि इनके कॉन्फिडेंस से बिल्कुल मत
डरिए वो झूठ का कॉन्फिडेंस है वो
कॉन्फिडेंस एक एक्टिंग है जैसे हमारे पीएम
साहब ने एक्टिंग बाकायदा सीखी यह सब जानते
हैं कि उन्होंने बाकायदा भाषण देना और
बाकी सारा कुछ सीखा जिसको वो फॉलो करते आ
रहे हैं वैसे ही उनके प्रवक्ता उनके लोग
एक एक्टिंग सीखते हैं कॉन्फिडेंस के साथ
बोलने की नंबर वन दूसरा जिस नेशनलिज्म की
बात करते हैं रा वाद की बात करते हैं इस
देश में अगर राष्ट्रवाद किसी कोई पार्टी
लेकर आई थी और किसी पार्टी को 1947 तक
दुनिया राष्ट्रवादी कहती थी तो वो इकलौती
कांग्रेस पार्टी थी इनको कभी राष्ट्रवाद
नहीं कहा गया है इनका नस्लवाद है धार्मिक
राष्ट्रवाद है जो राष्ट्र को तोड़ने वाला
है और आखरी बात मैं यह कह के यहां से जा
रहा हूं कि चाहे वह कश्मीर का मसला जब
उठाए आप मणिपुर का मसला उठा दीजिए आप ये
पूछिए कि कश्मीर का तो जो हुआ सो हुआ हो
चुका ज्यादातर चीजें हो चुकी कश्मीर में
लोग सटल है जैसे रहना है वह अपने दर्द के
साथ रहते हैं मणिपुर तो हस्ती खेलती जगह
थी मणिपुर में तो कहीं कोई समस्या नहीं थी
कांग्रेस का राज हो चाहे अटल बिहारी
वाजपेई का राज हो कभी कोई इस तरह की बात
नहीं सुनी गई ऐसा क्या हुआ कि आप सत्ता
में आते हैं और चार महीने मणिपुर लगातार
जलता रहता है आपकी हिम्मत नहीं होती है
वहां जाने की उसका नाम लेने की सिर्फ
इसलिए क्योंकि मीडिया आपके पास है मीडिया
उसका नाम नहीं लेगी आपने क्या संभाला है
कौन सा प्रदेश है जहां आपने अमन चयन
स्थापित किया किसान हरियाणा में है अभी
हरियाणा और पंजाब के बॉर्डर पर किसान है
और जाम दिल्ली में लगा हुआ है उसके लिए
किसान जिम्मेदार है आप एक कमेटी बनाते हैं
किसानों के लिए दो साल तक वो कमेटी कुछ
बोलती ही नहीं है खामोश बैठी रहती है उसके
बाद जब किसान आने की बात करते हैं तो आप
डंडा चलाना शुरू कर देते हैं छात्र आने की
बात करें आप डंडा चलाना शुरू कर देते हैं
और आरोप नेहरू पर लगाएंगे जो उस दौर में
हिंदुस्तान को बना रहे थे थे जिस दौर में
वाकई हिंदुस्तान के पास कुछ नहीं था ना
पैसे थे ना ताकत थी ना कुछ था और वहां से
64 तक वो लेकर आते हैं जहां हिंदुस्तान एक
विकासशील देश बन चुका है ये मोटी मोटी
बातें हैं आप लोगों के बीच में था तो बहुत
सारी चीजें निकल गई मुंह से बहुत सारी
चीजें मन किया शेयर कर लू लड़ाई तो आप लोग
ही लड़ रहे हैं हम लोग तो घर में बैठ के
ईधन तैयार करने का काम कर सकते हैं तो
जैसा मैं हर जगह कहता हूं कि गांधी और
नेहरू के सिपाहियों को मेरा सलाम आप लोग
लड़ते रहिए हम लोग हम लोग को जैसे लोगों
से जो कुछ हो सकेगा लगातार करेंगे बहुत
शुक्रिया

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