‘I.N.D.I.A’ ब्रिगेड PM Modi से भिड़ने को तैयार। THE INSIDE STORY। Sanjeev Trivedi, Himanshu Mishra

नमस्कार मैं हं मंशु मिश्रा और आप देख रहे
हैं द इनसाइड स्टोरी तो कहावत है देर से
आए लेकिन दुरुस्त आए इंडिया गठबंधन के साथ
भी कुछ ऐसा ही होता हुआ नजर आ रहा है जो
इंडिया गठबंधन एक महीने पहले तक टूटता हुआ

बिखरता हुआ नजर आ रहा था वह अब जुड़ता हुआ
संगठित होता हुआ भारतीय जनता पार्टी के
खिलाफ एनडीए के खिलाफ एकजुट होकर लड़ता
हुआ नजर आ रहा है पिछले कुछ दिनों में ऐसी

घटनाएं हुई है राजनीतिक तौर पर जिनसे यह
साफ तौर से नजर आता है तो अब स्थिति क्या
बन गई है इसको लेकर चर्चा करेंगे डॉक्टर
संजीव त्रिवेदी जी वकार हमारे साथ संजू जी
अखिलेश यादव के साथ बात बन गई केजरीवाल के

साथ बात बन गई तेजस्वी के साथ पहले से बनी
हुई थी बात ममता बनर्जी के साथ भी बातचीत
हो रही है क्या संकेत मतलब जो चीजें
बिखराव था वह अब एक टेबल पर आकर बातचीत

करने को तैयार हो गए ऐसी क्या स्थिति बन
गई और यह कैसे संभव हो पाया
अचानक देखि चंडीगढ़ में मेयर के इलेक्शन
का नतीजा सुप्रीम कोर्ट में
आया और उस इलेक्शन के नतीजे

में एक इंडिया गठबंधन की जीत हुई है यह
कहते हुए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस
दोनों नजर
आए
संदेश जो चंडीगढ़ से निकला कि इंडिया
गठबंधन

तमाम पच लगाने के बावजूद विजय हुई जीत हुई
मामला सुप्रीम कोर्ट तक आया एक शहर के

मेयर का इलेक्शन था को बहुत ज्यादा बड़ा
इलेक्शन नहीं था लेकिन जिस तरह से उसे
लड़ा गया और जिस तरह से इलेक्शन के
प्रोसेस में खामिया सुप्रीम कोर्ट ने
पकड़ी और उसके बाद दोबारा से वह पूरा का
पूरा जो प्रोसेस है उसे खारिज किया गया और

जिसकी जीत होनी चाहिए थी उसे जीत थमाई गई
और यह सब कुछ इतने प्रचारित तरीके से हुआ
सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है मीडिया
कवर कर रही है कि उसने ऐसा लगा कि एक
इंडिया गठबंधन के भीतर के दो कंसीट जो थे
उनकी राजनीति को दोबारा से करीब आने का

मौका
दिया और यह संदेश दरअसल सबसे बड़ा ट्रिगर
का काम उसने
किया दूसरी वजह रही के राहुल गांधी उत्तर
प्रदेश में जिसम आए वह और उत्तर प्रदेश
में जिस वक्त आए वह और जैसे ही उनकी

यात्रा आ
रहे वह एक गति पकड़ी लोगों की भीड़ जिस
तरह से सामने से उनका स्वागत करने
लगी इन सब चीजों ने भी एक संदेश दिया कि

जो जमीन पर उतरा हुआ व्यक्ति है और लोगों
के मुद्दे की बात कर रहा है
तो उस पार्टी और उस व्यक्ति को छोड़ कर के
आगे बढ़ना बहुत सही राजनीतिक कदम नहीं
होगा मामला तो दो तीन सीटों पर ही फंस रहा
था हम तो आपको याद होगा जून के महीने में

पिछले साल जो बैठक हुई थी पटना में उसमें
एक संकल्प बना था कि एक दूसरे को हम लोग
नुकसान सहके भी
अकोमोडेटिव और शायद यही एक
सूत्र इस वक्त काम आया और यह गठबंधन बना
यानी कि हम लोग जो बात कर रहे थे कि

इंडिया भले ही टूट रहा है लेकिन वह जो
आइडिया है वह अभी भी जिंदा है और उस
आइडिया ने एक बार फिर से संजीव दन देने का
काम किया है पूरे गठबंधन को और यह जो
टर्निंग पॉइंट था यह मेयर इलेक्शन रहा अब

आगे की स्थिति किस तरह से देखते
हैं दूसरी तरफ क्या स्थिति है यानी कि यह
तो इंडिया का खेमा है एनडीए में क्या
स्थिति है वहां पर जो चीज है वो क्या

नॉर्मल तरीके से आगे बढ़ रही है या फिर
वहां कुछ खिट पिट देखने को मिल रही है
क्या है
वहां देखिए जब सामने का जो सहयोगी होता है

वह बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली और पावरफुल
होता है तो अंदर की जो खिट पिट होती है वह
बाहर नहीं आती है लेकिन आप बहुत सी ऐसी
चीजें हैं जिसको आप बहुत आसानी से महसूस
कर सकते

हैं मैं बात करूंगा बिहार की बिहार में
आपको याद होगा कि
जो शपथ लिया गया और उसके बाद जिस तरह से
बहुमत साबित किया गया 28 जनवरी को शपथ दी
गई और अब करीब करीब एक महीना होने को

आया अभी तक मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं
हुआ
है
अमूमन एक मंत्रालय एक मंत्री या दो
मंत्रालय ज्यादा से ज्यादा होता है लेकिन

मात्र
नौ मंत्री हैं मुख्यमंत्री मिला कर के और
वह तमाम 4045 जो विभाग है उसको अपने हाथ
में रखे हुए हैं किस तरह का गवर्नेंस हो
रहा होगा बिहार जैसे राज्य के साथ जहां
गवर्नेंस की इतनी आवश्यकता है क्या चीज है

जो यह होने नहीं दे रही है
विस्तार और जब तक विस्तार नहीं हो जाता है
तब तक इस बात की उम्मीद कैसे की जाए कि
एनडीए सहयोगियों के बीच सीटों का बंटवारा
फाइनल हो

जाएगा पहला काम तो विस्तार है उसके बाद ही
तो सीटों का बंटवारा है लेकिन बातें बाहर
नहीं आ रही है पर कहीं ना कहीं ये महसूस
हो रहा है कि कुछ बात तो ऐसी है जो नीतीश
जी और बीजेपी के

बीच बहुत सही नहीं है

वह कहीं ऐसा तो नहीं है कि नीतीश जी को
दोबारा सोचने पर मजबूर कर दे और वो सोच भी
सकते वो कुछ भी कर सकते हैं पटना के सत्ता
गलियारों में इस तरह की चर्चाएं शुरू हो
गई अच्छा के नीतीश जी को मिला क्या क्या

वो इंट्रोस्पेक्ट कर रहे हैं क्योंकि वोह
तो दो तिहाई बहुमत वाली सरकार चला रहे थे
ना प्रचंड बहुमत की सरकार उनके पास थी 160
के आसपास उनके पास विधायक थे हालांकि उनकी
अपनी विधायकों की संख्या बहुत थोड़ी थी
लेकिन उनकी सरकार तो बहुत जबरदस्त तरीके
से चल रही थी लेकिन अभी जो स्थिति है
उसमें

122 के मैजिक फिगर में वो उस दिन 130 लेकर
आए थे स्पीकर का एक घटा दीजिए और एक जो
डिप्टी स्पीकर थे
उन्होंने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया

और वह लोग सभा चुनाव लड़ना चाहते
हैं कुछ इस तरह की बातें हैं महेश्वर
हजारी तो पांच या सात
के बहुमत से चल रही सरकार वो बहुत स्टेबल
सरकार नहीं है अगर उसमें दोनों पक्ष बहुत
खुल कर के एक दूसरे का सहयोग ना करें तो
पर सहयोग का वो भाव जो पहले दिन दिखा था

उसके बाद से अभी तक नहीं दिखा
है उत्तर प्रदेश में आप देख लीजिए कि
अनुप्रिया पटेल है ओपी राजभर है संजय निषद
है यह लोग छोटे सहयोगी हैं और इन सबों को
बहुत उम्मीदें हैं अनुप्रिया पटेल को लग
रहा है कि हो सकता है कि एक आज सीट हमारी

बढ़े
राजभर कह रहे हैं कि कैसे हो जाएगा सीटों
का बंटवारा जब तक कि प्रदेश में हमें
मंत्री बनाने का जो वादा है वह पूरा नहीं
होता है वो तो बेचारे बैठे हुए हैं बड़े
इंतजार में और उनके अंदर की जो बेचैनी है
वह झलक भी जाती है कैमरे पर वो हो गए दारा

सिंह हो गए ये सब इंतजार में बैठे थे
इसीलिए पलटी मार कर आए थे इधर कुछ हो नहीं
पा रहा है ये खिट पिट जो है लेकिन बाहर
नहीं आ रही है ये बात है के इसको बहुत
करीने से सवार करके रखा गया

है उसी प्रकार आप अब महाराष्ट्र चल लीजिए
महाराष्ट्र में जितनी सीटें उद्धव लड़ा
करते थे बीजेपी और शिवसेना गठबंधन जो हुआ
करता था उतनी ही सीटें चाहते हैं कि

शिंदे शिवसेना को मिले क्योंकि अब तो
ओरिजिनल शिवसेना उनके पास है अजीत पवार भी
उतनी ही सीटें चाहते हैं लड़ना जितना कि
उनके चाचा ओरिजिनल एनसीपी के सुप्रीमो शरद

पवार कांग्रेस के साथ गठबंधन में ल लड़ा
करते थे तो और कांग्रेस इन सबों से बड़ी
पार्टी कह कहती थी अपने आप को तो वह क्यों

छोड़े भारतीय जनता पार्टी तो खुद चाहती है
कि जितना पांव पसारा जा सके पसार दिया जाए
तो वह क्यों छोड़े उसने तो 2014 में अकेले
चुनाव भी लड़ा
था और अच्छी सफलता भी प्राप्त की थी बिना

शिवसेना के मदद के तो जाहिर है कि वो अपनी
जमीन क्यों छोड़ने लगे मुख्यमंत्री का का
पद तो छोड़ दिया लेकिन उसके बाद पार्टी भी
दिलवा दी नहीं वहां असमंजस की स्थिति है
ना कि अगर छोड़ देंगे तो क्या स्थिति

बनेगी क्योंकि एमवीए जो पहले था जिसमें
सरकार चल रही थी जिसके बल पर उसको देखते
हुए तो स्थिति यही लग रही थी कि एक तरफ
नीतीश कुमार बिहार में और दूसरी तरफ ये
एमवीए यह पूरा खेल खराब कर देगा 2024 का

लोकसभा का लेकिन किस तरह से नीतीश कुमार
जी इधर आए और खेल उधर पलटा और अब इधर जो
सहयोगी आप पाए हैं धीरे-धीरे करके
उनको अगर छोड़ देंगे तो भी नुकसान है और
साथ लेकर चल रहे हैं तो किस बिना पर उनको
किस आधार पर ज्यादा सीटें दी जाए या फिर

जो जितनी वो मांग कर रहे हैं वह अपने
हैसियत के हिसाब से मांग कर रहे हैं उससे
ज्यादा तो नहीं कर रहे हैं तो ये मैनेज कर
पाना थोड़ा मुश्किल दिख रहा है अभी गुणा
गणित लगा पाना दूर से ही डिफिकल्ट लग रहा

है जितनी सीटें मांग रहे हैं उस हिसाब से
48 में पूरा नहीं
होगा फ दूसरे राज्यों में जाना पड़ेगा जी

हां तो ये तो स्थिति है तो एनडीए में सब
कुछ सेट हो गया है ऐसा नहीं है अब देखिए
दक्षिण में दक्षिण में किसके साथ जाएगी
भारतीय जनता पार्टी क्योंकि तमिलनाडु में

जहां से उम्मीद है बहुत ज्यादा थी भारतीय
जनता पार्टी को वहां एआईए डीएम के ने
पल्ला झाड़ लिया है वहां की जो अपनी
अंदरूनी राजनीति होती है उसमें बीजेपी के
साथ सहयोगी बने रहना वो खतरनाक उसके लिए

होता हम तो बीजेपी से शिकायत ना होते हुए
भी उसने अपने आप को पीछे कर दिया है केरल
में अकेले जाना है और कितना प्राप्त किया
जाएगा यह देखा जाएगा तो दक्षिण की स्थिति

केवल कर्नाटक को अगर आप छोड़िए तो बाकी हर
जगह पर बहुत अच्छी माकूल नहीं नजर आती है
लेकिन सहयोग का जहां तक सवाल है दक्षिण
में एक सहयोगी है कर्नाटक में लेकिन उनके

साथ भी गठबंधन
एचडी देव गौरा जनता दल सेकुलर उनके साथ भी
फाइनल नहीं हुआ है अभी तो आप देखिए कि
केवल इंडिया गठबंधन में ही यह हर बड़ी
नहीं है कि चीजों को दस्त किया जाए भीतर

खाने हर बड़ी तो एंडिए में भी है और एनडीए
में तो अभी तक वो इंडिया गठबंधन की चीजें
सतहों पर दिखाई पड़ती है लोग एक दूसरे से
बोलते रहते हैं ममता जी नाराज हो जाती है
ख खुल के बोल देती है पर इंडिया में बोलते

लोग नहीं है पर वहां भी चीजें जो है अभी
सलटायर है य ये आरोप जो है विपक्ष लगाता
है अ तो अभी की स्थिति यह देखी जाए कि

फिलहाल के लिए इंडिया एक कदम आगे है सीट
शेयरिंग को लेकर क्योंकि जिस तरह से पिछले
कुछ दिनों में चीजें सॉल्व हुई है उससे
लगता है कि कांग्रेस पार्टी थोड़ा अपने आप
को झुकाने की और विनम्र होने की थोड़ा नम

होने की कोशिश कर रही है क्या यह लगता है
सीट शेयरिंग का जो फार्मूला पिछले कुछ
दिनों में देखने को मिला है क्योंकि बात
हो रही है बंगाल की भी वहां दो सीट देने
को तैयार है तो कह रहे हैं ठीक है वहां भी

चल जाएगा काम क्या देखिए दो वजह हैं
इस इस तरह के गठबंधन जो इंडिया गठबंधन में
होते हुए दिखाई पड़ रहे
हैं हालांकि फॉर्मल जो घोषणाएं हैं वो
बाकी है लेकिन जो खबरें आ गई है मीडिया

में एक तो देखिए यह वजह है कि अस्तित्व का
सवाल उत्तर प्रदेश में जो स्थिति है अभी
इस
वक्त अगर आप पिछले चुनाव को देखें आप
पाएंगे कि वो 50 फीसद के आसपास वोट लेकर
के तैयार है भारतीय जनता
हम तो आपके पास कोई वजह नहीं है कि आप
गठबंधन ना बनाए
हम कोई वजह नहीं है कि आप गैर भाजपा वोटों

के विखंडन में अपना सहयोग दें अपनी पूरी
ताकत झोकना पड़ेगा मजबूरी है आपको मजबूरी
है कि आप साथ आए यह बहुत आवश्यक है साथ
आने से भी क्या हो जाएगा कुछ कोई गारंटी

नहीं है क्योंकि जो आंकड़े हैं वो तो यही
कहते हैं कि जो बीजेपी है उसका वोट
प्रतिशत बढ़ता रहा है आपको जान के आश्चर्य
होगा कि 2014 में जो वोट प्रतिशत था और

 

उसके हिसाब से 73 फ सीटें आई थी एनडीए को
2000 19 आते आते वह सीटें घट गई क्योंकि
15 सीटें तो अकेले सपा बसपा लेकर आ गई थी
तो आंकड़ा भले ही घट

गया भारतीय जनता पार्टी का लेकिन जो
वोटिंग परसेंटेज था वो भाजपा का बढ़ गया 7
फीसद ज्यादा वोट 2014 से 2019 में भय जनता
पार्टी को आए थे और 7 पर उत्तर प्रदेश के
लिहाज से बहुत है बहुत है और यानी कि हर

उस कंटस में जहां जीत दर्ज की गई थी वहां
जबरदस्त जीत दर्ज की गई
थी ये एक बहुत बड़ी वजह थी फ वोट मिले तो
वोट मिले थे तो सीटें भले घट गई लेकिन वोट

परसेंटेज बढ़ा तो एक्सेप्टेबिलिटी जो
पार्टी की होती है वो उत्तर प्रदेश में
जबरदस्त रही पर दूसरी तरफ यह भी है
कि वोट्स का जो एक एक नेचर जो होता है
कंसोलिडेशन का वो देखता है सामने वाला जो
एक कैंडिडेट नहीं है वो छिटक
है तो अगर सपा भी लड़ रही है बसपा भी लड़
रही है कांग्रेस भी लड़ रही है जो पिछली
बार के हालात थे तो बेहतर है कि फ्लोटिंग

वोट बीजेपी की तरफ आ जाते हैं एक बहुत
बड़ा फैक्टर होता है बीएसपी का जो वोट
बैंक है कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में
मान लीजिए 20 फीसद के आसपास दलित आबादी है
उसमें ज्यादातर जो वोट है वो जाटव समुदाय
के हैं जाटव समुदाय जो कि अपना एलिजेंस
मायावती जी से रखता

है तो पिछली दफा यह था कि अब सपा और बसपा
का गठबंधन हो गया नेता तो गठबंधन कर लेते
हैं पर नीचे गठबंधन
सामाजिक समीकरणों की वजह से कई दफे नहीं
होता है जैसे जाटव और यादव यह आपस में
प्रतिद्वंदी कौम है लड़ती है तो बहुत

जगहों पर यह जो बसपा का वोट बैंक था खास
तौर पर जाटव का यह बीजेपी में चला
गया गठबंधन के बावजूद क्योंकि जहां जहां
सपा का कैंडिडेट था वहां बीएसपी वोट्स ने
सपा को वोट ना देकर वो बीएसपी की तरफ
उन्होंने बीजेपी की तरफ उन्होंने रुख कर
लिया इसका बीजेपी को बहुत लाभ हुआ

था इसका बीजेपी को बहुत लाभ हुआ था इस बार
एक फैक्टर यह है कि जो वोट्स है कमिटेड
वोट बैंक है बहन कुमारी मायावती का वो
उनके साथ र गा हार में या जीत में किंचित
नहीं भयभीत में तो ये उनका वोट बैंक है जो

कि उनके साथ रहेगा वो उनको नहीं छोड़ेगा
वह अगर गठबंधन कर लेती तो नीचे वाले को
अगर पसंद नहीं है वोह उम्मीदवार जैसे उसके
क्षेत्र में सपा का उम्मीदवार तो उसको
पसंद नहीं है तो वो बीजेपी को वोट देता है
और ये हकीकत है कि बड़ा एक शेयर है दलित

आबादी में जिसने भारतीय जनता पार्टी को
2014 के बाद वोट देना शुरू कर दिया है और
शायद यह भी एक वजह है कि बहन कुमारी
मायावती थी इस बार वो किसी से गठबंधन नहीं
कर रही है क्योंकि उनको अपने वोट बैंक
संभालना है 2027 के लिए ये बहुत जरूरी बात

है ये तो वो एक शेयर है जो इस बार बीजेपी
को नहीं जाएगा दूसरा यह है कि कांग्रेस और
बीजेपी कांग्रेस और एसपी सपा ये दोनों
अलग-अलग लड़े थे अब दोनों साथ आएंगे मान
लीजिए 6 सा फीसद ही वोट आए थे कांग्रेस को
और मात्र 37 सीटों पर लड़ी थी सफा और उसने

19 फीदी वोट पाए थे अब वो 37 से बढ़कर के
60 61 62 63 जितने भी प लड़ती है तो उसकी
शेयर बढ़ती है और कांग्रेस की वोट बैंक जो
है जहां भी है 6 7 पर जो भी उसका वोट शेयर
है इतना ही आया था उसको पिछली दफा वो

उसमें जुड़ता है हम तो जहां वोट शेयर
बीजेपी का अपने दम पे जितना है उसका वो
रहेगा उतना ही उसमें इ इंक्रीज आएगा सपा
में क्योंकि ऑप्शन के तौर पर एक ही
उम्मीदवार दिखेगा विपक्ष में हम जो गैर
भाजपा वोट है उसको ऑप्शन के तौर पर बीएसपी
नहीं दिखेगा या कोई और लड़ जाता है वह

नहीं दिखेगा उसे लगेगा कि यही एक क्रेडिबल
अल्टरनेटिव जिसको कहा जाता है तो इसका लाभ
होगा बीजेपी के कुछ वोट शेयर में कमी आएगी
इसलिए वो क्योंकि कुछ कुछ उसको आउटसाइड
वोट्स मिले थे बीएसपी के वोट्स फ्लोटिंग

वोट्स इस तरह के तो वो आएगी और दूसरी तरफ
ये लेकिन क्या ये काफी होगा यह देखना होगा
पर टक्कर हो जाएगा सपा और कांग्रेस के जो
वोटर है वो आपस में कंफर्टेबल रहेंगे मतलब
कॉमिनेशन क्या कहता है जैसे सपा और बसपा

आपस में नहीं कंफर्टेबल थे वो ऊपर गठबंधन
हो गया नीचे जो वोटर्स है वो कंफर्टेबल
नहीं थे लेकिन जो कांग्रेस का वोटर है वो
क्या समाजवादी पार्टी के साथ कंफर्टेबल है
या फिर समाजवादी पार्टी का जो कोर वोटर है

एमवाई समीकरण उनका कहा जाता है इस बार तो
उन्होंने पीडीए का नारा भी दिया है वो
क्या कांग्रेस के साथ कंफर्टेबल होगा
क्योंकि जुड़ने के बाद वोटर कंफर्टेबल रहे
तभी एकता नजर आती है बड़े भाई की भूमिका
में समाजवादी पार्टी है ज्यादा सीटों पर
लड़ रही है कंफर्टेबल है वोटर देखिए

कंफर्ट या डिस्कंफर्ट आधार वोटों के टकराव
और मैत्री पर आधारित होता है आधार वोट
यादव है सपा के आधार वोट जाटव है बसपा के
इन दोनों का टकराव है उत्तर प्रदेश के कुछ

क्षेत्रों में जाहिर है कि वहां पर ये
टकराव है कांग्रेस का तो कोई आधार भट ही
नहीं है ना कांग्रेस का तो कोई सब वैचारिक
वोट है विचारधारा के हिसाब से राजनीति
करते हैं जातीय गोलबंदी में विश्वास नहीं
करते हैं लोहिया एक टाइम था जब अपर क्लास

का माना जाता था कि कांग्रेस वो सारे
भारतीय जनता पार्टी की तरफ जा चुके हैं जो
अगड़े वोट कहे जाते थे यानी कि वो वो क्या
कांग्रेस अगर रिवाइव करती है तो शायद वो

कुछ वोट जो है अगर इधर आए बहुत ज्यादा
प्रॉफिट इस गठबंधन को होने वाला है देखिए
कंसोलिडेशन हो सकता है बहुत वोट छोड़ कर
के बीजेपी को कांग्रेस की तरफ आएगा इस बात
की गुंजाइश जरा कम मुझे लगती है पर ये
जरूर है कि अच्छा उम्मीदवार और कॉमिनेशन

कई सीटों पर टक्कर देता हुआ आपको नजर आएगा
अच्छे-अच्छे
सीटें अच्छे-अच्छे उम्मीदवार उतारे जा रहे
हैं और इससे ऐसा लग रहा है कि आपको जैसे
आपको मैं बता देता हूं रायबरेली की सीट है
मान लीजिए रायबरेली में सपा का कोई
उम्मीदवार नहीं

होगा अमूमन बसपा के साथ एक अंडरस्टैंडिंग
रहती है अगर बसपा कोई उम्मीदवार नहीं देती
है या देती भी है और वैसा दे देती है जो
असर नहीं करता है बहुत ज्यादा तो एक सीधी
टक्कर होगी वहां पर हम और उसमें प्रियंका

गांधी के जीतने के फेयर चांस रहेंगे हम यह
बात मानकर चलिए उनके लिए स्टार्ट बड़ा
अच्छा हो गया इसीलिए उन्होंने फोन करके और
सब कुछ करके प्रयास सुनिश्चित कर दिया
उसको तो रायबरेली एक कंटेस्ट वाली सीट हो

गई अमेठी एक कंटेस्ट वाली सीट हो गई
बावजूद उसकी कि वहां पर स्मृति रानी जीत
चुकी है लेकिन अगर राहुल गांधी वापस आ
जाते हैं 50 55 हज वोटों का फासला है और
वहां पर लड़ाई अभी भी बहुत जबरदस्त कांटे

की लड़ाई है वो किसी भी दिन पलट जा सकता
है अब मान लीजिए कि ये जो सीटें है जैसे
मैनपुरी है डिंपल यादव लड़ेंगी वहां से
जीत निश्चित
है ये मानकर चलिए जो बदायूं की सीट है
बदाय की सीट शिवपाल लड़ रहे हैं अपने आप

में व एक ऐसी सीट होगी जहां पर जीत
निश्चित आएगी ही आएगी आप आजमगढ़ चलिए वहां
अखिलेश के लड़ने की गुंजाइश बताई जा रही
है वो सीट जीत
होगी सपा की तो इस तरह से करके देख रहा
हूं कि एक एक करके काउंटिंग करते करते कुछ
सीट जरूर होंगी जहां पर जबरदस्त टक्कर
होगी या अभी से सपा जीत में लड़ाई में आगे
दिखाई पड़ती है तो कंटेस्ट हो पाएगा एक तो

यह है दूसरी बात यह है कि इनके पास ऑप्शन
नहीं इसलिए था क्योंकि यह जो चुनाव है
इसमें आप देखिए जितने भी प्लेयर्स हम
जिनकी बात कर रहे
हैं आपने पूछा कि ये कैसे संभव हो पाया

जितने भी प्लेयर्स हम लोग बात कर रहे हैं
ये सब के सब कहीं ना कहीं आज की तारीख में
जांच एजेंसियों के दायरे में है आप जिसकी
भी बात कर लीजिए अब देखिए आय से अधिक

संपत्ति के मामले में अखिलेश यादव क्लोजर
हो गया है पर वो कभी भी केसेस खुल जाती है
क्लोजर होने के बात हेराल्ड केस में राहुल
गांधी परडी की जाच अखिलेश यादव अरविंद
केजरीवाल का सुन ही रहे हैं नया संबंध

सामने है सातवी बार सातवी बार उन्हें
बुलाया गया है तेजस्वी यादव तो जो
लैंड फॉर जॉब वाले मामले में तो बारबार आ
ही रहे हैं और ईडी की पूछता चल ही रही है

ममता जी भी ममता बैनर्जी के भतीजे जो है
उन तक पहुंची हुई
है एक मिनट के लिए अगर आप फर्ज करें कि
कुछ दोष है और कुछ चुनावी है मामला कुछ
दोष है कुछ चुनावी है मामला तो यह लड़ कर

के ही इससे पार पाया जा सकता है अगर
विखंडित होकर
के कुछ इस तरह की स्थिति बन गई कि कोई
नहीं जीत पाया तो उस स्थिति में तो सबों
को यह मानना पड़ेगा कि अब दोबारा आप उस
तरह से रह नहीं पाओगे जिस तरह से आज की
तारीख में हो नहीं वो वो वो जो एक उम्मीद
की किरण जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने
चंडीगढ़ में

जगाई आप आप आप आप चीटिंग कर रहे हैं सब
कुछ दिख रहा है बावजूद इसके आप वो चीटिंग
कर पा रहे हैं और सब कुछ बड़े इजली हुआ जा
रहा है यह देखकर कहीं ना कहीं पॉलिटिकल जो
नेता होते हैं उनकी भी एक एक चीज होती है
ना कि आप आप आप देखते हैं कि इस तरह से
अगर चीटिंग हो रही है तो हमारे इलाके में

भी हो सकती है हमारे साथ भी हो सकती है उस
पर कोई कुछ नहीं बोलेगा ऐसे में जब
सुप्रीम कोर्ट का डंडा पड़ा और यह पता चला
कि हां ठीक है इंडिया गठबंधन कम से कम कोई

तो देखने वाला है ऊपर वाला देख तो रहा है
सीजीआई जी ने कहा था तो ऊपर वाला अगर देख
रहा है तो चीजें सही होंगी यानी कि फेयर
होने की उम्मीद है और इसी उम्मीद के सहारे

जो है चीजें आगे बढ़ चली एक तो देखिए ये
है दूसरा ये है कि अगर मान लीजिए
कि अगर नहीं खड़े होते हैं
पॉलिटिकली तो फिर वह जो मामले करप्शन के
हैं उनका सियासी इस्तेमाल भी
होगा और फिर आने वाले दिन और बुरे होंगे
तो आपके पास दो ऑप्शन था या तो डर त्यागो

और एक साथ होकर के चुनाव लड़ो नहीं तो फिर
जैसे जो कहा जा रहा है जो आरोप लगाते य
रहते हैं कि हमारे खिलाफ ज एजेंसियों का

राजनीतिक इस्तेमाल होता है तो वो राजनीतिक
इस्तेमाल होगा हालाकि हम लोग दर् दर्शकों
सेय कह दे कि हम लोग बिल्कुल भी उनको
क्लीन चट नहीं दे रहे किसी को भी किसी को
भी नहीं प्रश्न तो ये है कि उसको तो तय
होना है हा हम दोष भी किसी का नहीं ठहरा
रहे वो काम एजेंसी का है हमारा नहीं वो

एजेंसी का भी काम नहीं है वो कोर्ट का काम
है हा मतलब कोर्ट में जाएंगे मामले पर
प्रश्न यहां पर ये था इनके पास कि क्या

करें देखिए एक लंच हो रहा था पिछले
दिनों कांग्रेस के बड़े नेता है सुप्रीम
कोर्ट लॉयर अभिषेक सिंह भी तो उनके
यहां
बैठे हुए थे कांग्रेस के अध्यक्ष और
केजरीवाल खड़गे जी और केजरीवाल तो एक
वीडियो पोस्ट किया गया

था आम आदमी पार्टी के द्वारा जिसमें कहा
गया जिसमें बातचीत के दौर में कह रहे हैं
केजरीवाल कि अगर सेक्शन 45 पीएमएलए का हटा
दिया जाए तो शाम तक वसुंधरा जी और शिवराज

जी भी अलग पार्टी बना लेंगे बिल्कुल तो
कहीं ना कहीं उनको यह लगता है कि सल ये
कानूनी रूप से कुछ इस्तेमाल होता है क्या
राजनीतिक इस्तेमाल होता है क्या और उस
कारण से हम फंसे हुए हैं तो इन सबों ने ये
जो फंसे हुए लोग हैं इन सबों ने टक्कर

लेने की सोची है यह दोषी हो भी सकते हैं
और ऐसे ही सुप्रीम कोर्ट या बिल डिनायर है
तो लेकिन इन्हें लगता है कि उसका लाभ लेकर
के बीजेपी जीत जाए इससे बेहतर है कि हम
उससे भिड़ जाए और भिड़ने के लिए साथ आना

जरूरी था और ये साथ आ जनता की अदालत में
अब फैसला होगा देखिए क्या होता है लोकसभा
चुनाव के ऐलान को लेकर भी खबर है कि जल्द
ही ऐलान भी हो सकता है 13 मार्च के बाद
कभी भी ऐलान हो सकता है यह जानकारी निकलकर
सामने आ रही है लेकिन क्योंकि अब ज्यादा

समय नहीं बचा है और इंडिया एक बार फिर से
एकजुट हो चला है ऐसा दिखाई दे रहा है आगे
क्या स्थिति बनेगी नहीं कह सकते लेकिन अभी
जो पिछले एक हफ्ते के अंदर जो
परिस्थितियां बनी है उसमें लग रहा है कि
इंडिया गठबंधन भारतीय जनता पार्टी एनडीए

के खिलाफ खड़ा हो चुका है क्या आगे होगा
देखेंगे अपडेट आपको न्यूज़ 24 पर मिलती

रहेगी आपको क्या लग रहा है इस मुद्दे से
जुड़े हमें कमेंट करके बताइए बहुत-बहुत
शुक्रिया

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