Loksabha Elections 2024: Rahul Gandhi Amethi और Priyanka Gandhi Raebareli से लड़ेंगी लोकसभा चुनाव!

एक बार फिर इस पर चर्चा शुरू हो गई है कि
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अमेठी और
रायबरेली से चुनाव लड़ेंगे हालांकि पिछले
चुनाव में राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार

गए थे और तब से महज चार बार अमेठी पहुंचे
हैं तो ऐसे में क्या वाकई में राहुल गांधी
को अमेठी एक्सेप्ट करेगी कि या नहीं करेगी

यह तमाम ऐसे सवाल है दूसरी अगर सीट की बात
करें तो राय बली से प्रियंका गांधी के
चुनाव लड़ने की उम्मीद जताई जा रही है तो
प्रियंका गांधी को राय बली में क्या

रिस्पांस मिलने वाला है इस पर बात करने के
लिए हमारे साथ कई वरिष्ठ पत्रकार हैं तम अ
जिस तरह से यह कहा जा रहा है कि प्रियंका
और राहुल अमेठी और रायबरेली वापसी करेंगे
क्या कांग्रेस का भविष्य इन दो सीटों से

उत्तर प्रदेश में सुधर सकता है देखिए यह
दो सीटें तो कांग्रेस के लिए आज से नहीं
कितने दशकों से अपनी एक परंपरागत स्ट्रांग
होल्ड के तौर पर रही है और यह माना जाता

था कि पूरे प्रदेश में कांग्रेस कहीं जीते
ना जीते यहां तो जरूर जीतेगी वहां के
लोगों ने भी लगातार समर्थन दिया है पार्टी
का और इन दोनों जो परिवार के सदस्य यहां
से खड़े हुए हैं उनका लेकिन पिछले प कुछ

सालों में मुझे लगता है यह समर्थन कुछ
दरकता हुआ कमजोर होता हुआ दिख रहा है और
पिछली जैसे राहुल गांधी चुनाव हारे और
वायना ना पहुंचे होते तो मुश्किल हो जाती
उनके लिए तो इस बार अगर राहुल गांधी

दोबारा अमेठी आते हैं तो उनकी एब्सस जो
पिछले पा साल वहां पर रही है उसको तो
मेकअप करना ही होगा और दूसरा उन्हें अमेठी
के लोगों से फिर एक जुड़ाव पैदा करना
पड़ेगा यहीं के लोगों के प्रति समर्पित है

कई सालों में नहीं दिखा तो उनके लिए
मुश्किल वहां है हां रायबरेली वहां की
जनता ने सोनिया गांधी का साथ दिया है
हरनाव जीत लोकसभा तो अगर वह चुनाव नहीं
लड़ रही है जैसा कि बिल्कुल स्पष्ट है तो

उनकी जगह पर अगर प्रियंका गांधी वाडा
चुनाव लड़ती हैं तो उन्हें भी वह समर्थन
मिल सकता है क्योंकि वहां के लोगों में
देखा गया है कि समर्थन में वोट शेयर में

कमी भले ही आए लेकिन उनका एक सपोर्ट और एक
इमोशनल सपोर्ट सेंटीमेंटल कारणों से वोह
परिवार के सदस्यों के प्रति है तो अमेठी
में स्थिति थोड़ी सी मुश्किल लगती है

लेकिन राय बरेली में ऐसा हो सकता है कि
कांग्रेस अपनी सीट बचा ले जाने में सफल हो
हमारे साथ वरिष्ठ पत्रकार विजय उपाध्याय

जी है सवाल यह है आप तो आस बगल की सीट से
ही आते हैं आपका जनपद बगल में है अमेठी और
रायबरेली की जिस तरह की तस्वीर देखने को
पिछले कुछ सालों में मिली राहुल गांधी अगर
अमेठी से चुनाव लड़ते हैं तो क्या

परिस्थिति दिखने वाली अगले 5 साल में और
प्रियंका अगर रायबी जाती है तो देखिए पहले
बात कर ले

अमेठी 98 में कांग कांग्रेस हार गई थी
वहां बीजेपी जीती थी 99 में सोनिया जी
वहां आई और उनके इलेक्शन कैंपेन को
प्रियंका गांधी ने संभाला था 99 में और एक
बहुत जबरदस्त विजय हासिल की सोनिया गांधी
ने उस समय अटल जी का लीडरशिप था एनडीए
बहुत मजबूत था लेकिन फिर भी अमेठी सोनिया
जी जीती और बहुत अच्छे वोटों से जीती 3
लाख से ज्यादा वोटों से जीती

थी उसके बाद राहुल जी आए 2004 से फिर वो
14 तक जीतते हैं 19 में हार जाते हैं

हारने का कारण भी इंटरनल था जो उनका
मैनेजमेंट था वो बहुत पुअर था गलत लोगों
के हाथ में वहां का चुनाव कैंपेन था तो
चुनाव हार गए अभी जो हालात हैं मुझे नहीं

 

लगता कि राहुल जी वहां चुनाव लड़ने के लिए
सीरियस हैं क्योंकि ना उनका अभी कार्यालय
एक्टिव हुआ है ना वहां के जो कांग्रेस के
कार्यकर्ता हैं उनको कोई निर्देश आया है
ना बूथ कमेटियों का रिन्यूअल हुआ है

और जब यह न्याय यात्रा लेकर वहां गए थे तब
भी इन्होंने कोई चर्चा चुनाव लड़ने की
नहीं की तो आप एक ऐसा इलाका जो आपका
परिवार रहा हो आपका घर रहा हो वहां आप

बहुत ही परेशान है वहां के कांग्रेसी कि
राहुल या गांधी परिवार का कोई चुनाव
लड़ेगा कि नहीं लड़ेगा सब तरह-तरह के सवाल
पूछते रहते हैं लेकिन इन्होंने कोई संकेत
नहीं दिया अभी तक कोई संकेत नहीं है सिवाय
इसके कि हम लोग चर्चा कर रहे हैं कि राहुल
वहां से लड़ेंगे लेकिन ग्राउंड प कोई काम

वहां नहीं हो रहा है तो अगर राहुल सीरियस
है चुनाव लड़ने के लिए तो उनको ग्राउंड प
वर्क करना पड़ेगा उनके सामने चैलेंज बहुत
हैं जिस तरह से समाजवादी पार्टी के वहां
के रूलिंग जो समाजवादी पार्टी के सिटिंग
जो विधायक हैं गौरीगंज के वो भाजपा के साथ

उन्होंने वोट किया राजसभा में और जो अमेठी
की सपा की जो विधायक हैं महाराजी गायत्री
महाराजी प्रजापति तो वो एब्सेंट रही वो भी
एक तरीके से सपोर्ट रहा बीजेपी का तो
बीजेपी ने अपने को लगातार धीरे-धीरे करके

वहां ग्राउंड अपने को मजबूत किया है
कांग्रेस की एक्टिविटी वहां अभी उस तरह से
नहीं है त्रा को छोड़ दिया जाए अब आइए आप
रायबरेली रायबरेली तो फिरोज गांधी के
जमाने से परिवार की है फिर इंदिरा जी
लड़ती हैं फिर सोनिया जी लड़ती हैं और
रायबरेली में भी भी प्रियंका गांधी ने

बहुत ही मेहनत किया है उस सीट को लेकर
अ लेकिन वहां पे थोड़ी गतिविधियां अच्छी

कर रही है न्याय पंचायत स्तर पर उन लोगों
ने काम किया है हालांकि न्याय यात्रा में
कोई घोषणा नहीं हुई कि कौन चुनाव लड़ेगा
कौन चुनाव नहीं लड़ेगा अब चुनाव की
अधिसूचना आने वाली है तब अगर इनकी भी
चुनाव लड़ने की डेट आती है या चुनाव लड़ने
का अनाउंसमेंट आता है तो आप समझ सकते हैं

कि बहुत मुश्किलें पेश आने वाली है जो
तैयारी करने का वक्त नहीं है और चुनाव आज
के जमाने में जब बीजेपी चुनाव लड़ती है तो
कॉर्पोरेट बमिंग करती है मल्टी लेयर
फंक्शन फंक्शन करती है वह चुनाव लड़ने के
लिए वो सारी चीजों को ये कैसे उसका काउंटर

कर पाएंगे अभी जो इनका ऑर्गना
स्ट्रक्चर है उसको किस तरीके से करेंगे
तमाम काम इनके पेंडिंग है और अगर वह सारे
काम पूरे होते हैं और अभी यह संकेत दिया
जाता कि कि यह चुनाव लड़ेंगी या जब सोनिया
जी की चिट्ठी आई थी उस चिट्ठी में अगर यह
बात आ जाती कि मेरे बाद प्रियंका वहां
चुनाव लड़ेंगी तो एक अलग स्थिति होती अब
चैलेंज बहुत बड़ा है इनके सामने कि ये इस
अपनी परंपरागत सीट पर कैसे अच्छे से लड़े
और खास तौर पर तब जब वहां मनोज पांडे जो
समाजवादी पार्टी के एमएलए थे वो भी बीजेपी
के साथ चले गए उन्होंने ना सिर्फ वोट दिया
बल्कि वो तो बीजेपी के साथ जाने ही वाले
हैं और मेरी जानकारी के हिसाब से वहां
समाजवादी पार्टी के अभी तीन और एमएलए हैं
वो मेरी जानकारी के हिसाब से वो भी सिंपता
इजर हैं सब मनोज पांडे के यानी कि वोह
जाने के पहले उन्होंने अपनी बात बात कर
रखी है
तो एक सीट बीजेपी के पास है चार सीट सपा
के पास थी रायबरेली में विधानसभा की तो जब
आपके पास ज्यादातर जो लोग हैं जो कांग्रेस
के पुराने लोग हैं कई तमाम लोग तो बीजेपी
जवाइन भी कर लिए अभी इनके जो ब्लॉक प्रमुख
वगैरह थे और दूसरे लोग थे तो बीजेपी
लगातार अपने को ताकतवर बना रही है और
कांग्रेस अ ठहरी हुई है या नीचे जा रही है
तो अब इस चैलेंज को कैसे फेस करेंगे दूसरा
जो परंपरागत तरीके से दोनों संसदीय
क्षेत्रों को जो लोग कांग्रेस के मैनेजर
के तौर पर या प्रियंका सोनिया के राहुल के
रिप्रेजेंटेटिव के तौर पर वहां देखते थे
उन लोगों को साइडलाइन कर दिया गया है नए
लोग आए हैं अब नए लोगों को पता ही नहीं है
कि किस इलाके का वोट किसके पास है कोई
नाराज है तो किसके कहने पर मान जाएगा यह
सारे फार्मूले उनके पास नहीं है तो बहुत
बड़ी चुनौती है अगर चुनाव लड़ना है तो
मुझे लगता है कि जल्दी से जल्दी घोषित
करेंगे तो शायद उनको लाभ होगा और जितना
देर करेंगे उतना इनको नुकसान हुआ अचानक
आके चुनाव आप पलट दें यह वह जमाना नहीं है
यह नरेंद्र मोदी का जमाना है जो जिसमें
कार्पेट बमिंग की तर और मल्टी लेयर फंक्शन
इनका चलता है तो उसका मुकाबला करने के लिए
समय इनके पास बिल्कुल नहीं है ठीक सर जिस
तरह से देखा गया कि पिछले चुनाव में राहुल
गांधी चुनाव अमेठी से हार गए स्मृति रानी
नया चेहरा थी उनको लोगों ने उन पर भरोसा
जताया लेकिन ऐसा नहीं है कि पिछले कुछ इस
पा साल में स्मृति रानी को लेकर नाराजगी
हो और जो अमेठी के लोगों के जो ब्लड में
कांग्रेस वाली स्थिति थी वह दोबारा हो जाए
और राहुल गांधी खाली खड़े हो जाए चुनाव
जीत जाए ऐसा कई बार बहुत सारे क्षेत्रों
में देखा भी गया देखिए ऐसा तो हर जगह संभव
है चुनाव में जैसे हमारे देश में जिस तरह
के चुनाव होते हैं उसमें ऐसे उलटफेर हुए
हैं लेकिन कुछ चीजें बिल्कुल फर्क दिखती
हैं इस बार पहला तो यह कि भारतीय जनता
पार्टी में जो एक सेल्फ कॉन्फिडेंस है एक
नए तरीके से चुनाव लड़ने की जो एक
प्रक्रिया उन्होंने पिछले कुछ सालों में
अपनाई है उसके चलते स्मृति ईरानी भी अपने
पूरे क्षेत्र में लगातार दौरे करती रहती
हैं लोगों के घर में जाकर मिलती रहती हैं
महिलाओं से और तमाम सारे वोटर से एक संवाद
स्थापित करती हैं तो मुझे ऐसा लगता है कि
उन्होंने वह कनेक्ट एस्टेब्लिश किया है जो
कि राहुल गांधी अपने समय पर करने की कोशिश
जरूर करते थे लेकिन कर नहीं पाते थे और
उन्हें जो परिवार के प्रति समर्थन उसका
फायदा मिलता था स्मृति रानी बिल्कुल साफ
है कि वह उत्तर प्रदेश से भी नहीं बिलोंग
करती हैं लेकिन जिस तरह से उन्होंने अमेठी
पर काम किया है अपनी कंसीट को लेकर और
तमाम सारी योजनाएं वहां पर लाई हैं वहां
पर महिलाओं के लिए तमाम सारे काम किए हैं
तो अपने लिए एक जगह तो उन्होंने बनाई है
यह हम मान सकते हैं कि उनका एक इमोशनल
कनेक्ट उस तरह से परिवारों के अंदर नहीं
है परिवार की बुजुर्ग महिलाओं पे
बुजुर्गों में उस तरह से नहीं है जैसे कि
कांग्रेस के प्रति वहां के लोगों का हुआ
करता था लेकिन यह कहना कि अगर राहुल गांधी
अपना कैंडिडेट वहां से अनाउंस करते हैं तो
रातों रात वह सारे सेंटीमेंट्स फिर उनके
पक्ष में चले जाएंगे यह मुझे मुश्किल लगता
है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने
जरूर जिस तरह से उनके चुनाव लड़ने का
तरीका है इस एस्पेक्ट को भी कंसीडर कर रखा
होगा जिसके लिए उन्होंने तैयारी कर रखी
होगी और तमाम सारे अभी चुनाव के ऐसे तौर
तरीके बाकी हैं जो अभी भारतीय जनता पार्टी
वहां पर एक्सरसाइज कर सकती है अगर वहां पर
रा गांधी पहुंचे तो इसलिए स्मृति रानी ने
अब जैसे वहां पर अपने घर की भी घोषणा कर
दी गृह प्रवेश भी कर दिया और तमाम तरह के
मैसेज देने की कोशिश की है कि अब वो यहीं
की होकर रहेंगी तो इससे लोगों को यह तो
लगता है कि राहुल गांधी कभी यहां रहेंगे
नहीं लेकिन स्मति रानी स्मृति रानी ने तो
घर भी बना लिया तो ऐसा हो सकता है कि
राहुल यहां से चुनाव लड़ने की कोशिश करें
या घोषणा करें तो कुछ उनके प्रति एक
सपोर्ट और समर्थन की भावना कुछ लोगों में
हो लेकिन अधिकतर लोगों को यह भी पता है कि
जिस तरह से उत्तर प्रदेश सरकार ने वहां के
लिए और पूरे क्षेत्र के लिए जिस तरह से
काम में सपोर्ट किया है वैसा किसी और यानी
कि कांग्रेस के सीट जीतने पर उनको नहीं
मिलेगा तो यह जो पोरली एक लाभ की वजह से
किसी को सपोर्ट देने की एक नई परंपरा शुरू
हुई है पूरे देश में इस वजह से भी शायद
राहुल गांधी को अब अचानक से समर्थन मिलना
मुझे तो मुश्किल दिखता है अच्छा रणनीतिक
तौर पर कांग्रेस के दो बड़े नेता राहुल
गांधी और प्रियंका गांधी दोनों उत्तर
प्रदेश से चुनाव लड़े अगल-बगल की सीट से
चुनाव लड़े कोई अमेठी से कोई रायबरेली से
कांग्रेस की इस रणनीति को आप किस तरह से
देखते हैं अगर इस तरह से रणनीतिक तौर पर
चुनाव लड़ते तो देखिए कांग्रेस की कोई
रणनीति साफ नहीं है न्याय यात्रा इनकी
यूपी आनी थी तीन बार उसका रास्ता बदला और
मीडिया को एकदम 11थ ववर में जानकारी दी गई
कि राहुल जी अब यहां आ रहे हैं इस तरह से
यात्रा का रूट होगा तो छिपा के यात्रा
कराई जा रही थी हम लोग खुद भी कोशिश कर
रहे थे जानने की किधर से रा यात्रा जाएगी
कहां रात्रि विश्राम होगा कहां जनसभा होगी
वह सब भी इवन की जो कांग्रेस कमेटी के जो
जिम्मेदार लोग हैं उनको शायद उनको ही नहीं
पता था तो व मीडिया को कैसे बताते तो यह
एक संकट हो गया दूसरा आप आपका कोई
कार्यालय अभी नहीं फंक्शनल है वहां अमेठी
में जो हमेशा इसके पहले के दौर में ऐसा
होता रहा है कि परिवार भले ही वहां से
चुनाव लड़े ना लड़े लेकिन कोई ना कोई
रिप्रेजेंटेटिव इनका वहां रहता था अमेठी
में वह स्थिति नहीं है एक नए तरीके की
कांग्रेस जिसका पब्लिक से जुड़ाव बहुत कम
हो रहा है बातें बहुत अच्छी हैं अटैक बहुत
जबरदस्त है मोदी जी पर लेकिन जो संगठन की
संरचना है और जो लोगों से संवाद है वह
बहुत कमजोर है तो यह एक बड़ा कारण है कि
जो इनको दिक्कत होगी माफ करिए दूसरा जो आप
कह रहे हैं बगल बगल की सीट चर्चा तो यह भी
है कि सो प्रियंका जी एक सीट रायबरेली
लड़ेंगी एक दक्षिण भारत लड़ेंगी मेडक की
आंध्र प्रदेश में राहुल जी के साथ साथ यही
सेम चर्चा है कि एक अमेठी लड़ेंगे एक
वायनाड या कोई और सीट हो सकती है तो
चर्चाएं है ये लेकिन वास्तव में क्या होना
है यह किसी को पता नहीं है सिवाय इनके कि
उनके उनके जो टीम के लोग हैं उनको लेकिन
अगर आप अपने अपनी एक्टिविटी नहीं शुरू
करेंगे तो एग्जाम के ठीक पहले आप कौन से
पांच इंपोर्टेंट
क्वेश्चन एक नंबर के और आप अगर रट के
जाएंगे तो नहीं कर पाएंगे आपको तो पुराने
जमाने का डिस्क्र है कि पांच 10 क्वेश्चन
रटा आपने अब अब ऑब्जेक्टिव क्वेश्चन आ गए
तो ऑब्जेक्टिविटी कांग्रेस में भी दिखनी
चाहिए उनके ऑर्गेनाइजेशन में भी दिखनी
चाहिए और आप अचानक आके चुनाव जीत जाएं ऐसा
वो दौर नहीं है क्यों बीजेपी 24 *
7 ग्राउंड प काम कर रही है जैसा सर ने कहा
कि वहां पे स्मृति ने अपना घर बना के एक
मैसेज भी दिया है दूसरी बात यह है कि
पुराने जमाने में आज से 20 साल पहले की जो
राजनीति होती थी उसमें सोसाइटी की अलग-अलग
लेयर थी ओबीसी क्लास किस तरह से वोट करेगा
वह आप अंदाजा लगा सकते थे जो शेड्यूल
कास्ट की जातियां हैं 66 वह किस तरह से
वोट करेंगी उसका आप अंदाजा लगा सकते हैं
वह आपके साथ रहेंगी कि आपके साथ नहीं आजकल
की राजनीति यह है कि ओबीसी की 79 जातियों
में सभी जातियां अलग-अलग तरीके से सोचती
हैं व कोई ग्रुप नहीं रहा मतलब कागज में
ग्रुप है सोसाइटी में और वोटिंग में और
राजनीति में वो ग्रुप नहीं रहा हम बात
जरूर उसकी लेकिन वहां कास्ट की बात होती
है जैसे आप राज भर कास्ट की बात कर निसाद
की बात करेंगे यादव की बात करेंगे कुर्मी
की बात करेंगे प्रजापति की बात करेंगे
यानी हर बिरादरी की आपको अलग-अलग बात करनी
पड़ती है आप ओबीसी वर्ग वाली बात नहीं है
है ना दूसरा ठीक ऐसे ही अब जो शेड्यूल
कास्ट ग्रुप है जिसको दलित वर्ग कहते हैं
बोलचाल की भाषा में तो शेड्यूल कास्ट में
भी जितनी 66 जातियां हैं हर जाति अपने
एजेंडे पर अपने तरीके से सोचती है और अपनी
पसंद पसंद के हिसाब से वह वोट देना चाहती
है या उसके लोकल लीडर है तो यह जो पटन
राजनीति का नया आया है शायद यह यह अब
लोगों को समझ में नहीं आ रहा लेकिन बीजेपी
इसको समझती है इसीलिए उत्तर प्रदेश में
बीजेपी ने किसके साथ तालमेल किया है
बीजेपी ने तालमेल किया है कुर्मियां की
पार्टी अपना दल सोनेलाल उसने तालमेल किया
निषद पार्टी यानी जो निषद समुदाय की
पार्टी है उसने तालमेल किया है राजभर से
जो राजभर की पार्टी है पोरली राजभर की
पार्टी जाटों की पार्टी आरएलडी से तालमेल
किया है यानी कि जो बड़े चंक हैं ओबीसी के
उनको अपने साथ लिया अब अति अति पिछड़े अति
दलित किससे जुड़ेंगे वो सीधे नरेंद्र मोदी
से जुड़ते हैं जितना नरेंद्र मोदी पर
ओबीसी होने का अटैक किया जाता है उतने ही
उनके वोट बढ़ते हैं क्यों बढ़ते हैं उनकी
कम्युनिटी को लगता है कि ओबीसी हैं इसलिए
वो हमारे लिए कर रहे हैं कर कैसे रहे
प्रधानमंत्री आवास है उजला योजना है
किसानों का सम्मान निधि है सहित तमाम
योजनाएं हैं जो लाभार्थी समूह है अ
कांग्रेस को भी लाभार्थी समूह का लाभ मिला
है 2009 के चुनाव में वो लाभार्थियों की
वजह से ही जीती थी दोबारा सत्ता में आई थी
मोदी जी उसको बराबर यूज तीसरी बार भी यूज
करना चाहते हैं लाभार्थी समूह उनके साथ
रहे तो यह जो राजनीतिक जो सिचुएशन है
इसमें आज की जो कांग्रेस की रणनीति व फिट
नहीं बैठती नजर आ रही है तो यह आप जो मोदी
का के विरोध का वोट है आप उसको 2019 के
हिसाब से देखें 90 पर वोट उत्तर प्रदेश का
दो पार्टियों में था वह था एक सपा बसपा
आरएलडी गठबंधन दूसरा बीजेपी गठबंधन बीजेपी
गठबंधन के पास 51 पर वोट था सपा बसपा
आरएलडी गठबंधन के पास 37 38 पर ही वोट आया
बाकी 65 पर वोट कांग्रेस के पास आया था तो
जो इस तरीके का जब वोटिंग पट है कि 990 पर
वोट दो गठबंधन को या दो पार्टियों को मिल
रहे हैं तो जाहिर है
कि चुनाव की की तस्वीर समझ में आती है कि
एक व्यक्ति जो समाज कैसे बटा हुआ है समाज
का जो गठबंधन व कैसे है समाज का गठबंधन है
मोदी के समर्थन में या मोदी के खिलाफ
पार्टियों का कोई मतलब ही नहीं रह गया
इसमें जो पार्टी बीजेपी के टक्कर में होगी
पब्लिक उसके साथ चली जाएगी तो जो गठबंधन
था 19 का वो टक्कर में दिखाई दिया इस बार
समाजवादी पार्टी विधानसभा चुनाव में
विधानसभा चुनाव में 80 पर वोट दोनों
पार्टियों को मिले सपा और बीजेपी को
बीजेपी को 44 पर वोट मिलता है और सपा को
37 पर वोट मिलता है तो ये जो सिचुएशन है
इस सिचुएशन के हिसाब से आपको स्ट्रेटेजी
बनानी पड़ेगी अगर आप स्ट्रेटजी नहीं
बनाएंगे तो आप 45 पर से नीचे आ जाएंगे और
चुनाव हार जाएंगे ठीक है जो कांग्रेस का
गढ़ था जिस पर कांग्रेस लगातार इस बात का
दावा कर रही थी कि अमेठी और रायबरेली ये
ऐसी सीट है जिस पर चुनाव हारा नहीं जा
सकता लेकिन उस गढ़ में बहुत सारी चीजें
उनका जो किला था वो दरग गया समाज वादी
पार्टी चकि उनके साथ गठबंधन में है उसी
इलाके के सारे समाजवादी पार्टी के नेता जो
है व भारतीय जनता पार्टी के साथ आ गए अब
सपा भी जो समर्थन कांग्रेस कोन दो सीटों
पर दे सकती थी शायद वो भी देने की स्थिति
में नहीं है हां यह बात तो बिल्कुल सही है
और जैसा अभी पिछले राजसभा चुनाव के दौरान
हमने देखा कि जिस तरह से समाजवादी पार्टी
के तमाम सारे नेता और विधायक धीरे-धीरे
करके अपनी ही पार्टी से दूर हो रहे हैं तो
उसके पीछे केवल एक ही कारण नहीं है तमाम
सारे कारण होंगे जिसमें कि उनके पार्टी के
अंदर जो एक कम्युनिकेशन नहीं था अखिलेश
यादव के साथ वोह एक कारण हो सकता है लेकिन
दूसरा कारण यह भी है कि वह जिस जाति को
रिप्रेजेंट करते हैं उस जाति का भी
समाजवादी पार्टी के साथ कुछ असंतोष बढ़ा
है तमाम सारे कारण सामने आ रहे हैं भले ही
वह राम मंदिर को लेकर हो चाहे वह बाकी
अन्य जातियों को जो ज्यादा महत्व दिया जा
रहा है उस परे उनका उनकी नाराजगी हो और भी
तमाम सारे व्यक्तिगत कारण भी हो सकते हैं
लेकिन सच तो यह है कि समाजवादी पार्टी जिस
तरह से उस पूरे क्षेत्र में अपना एक अपनी
पकड़ बनाए हुए थी वह तो कमजोर होगी ना अगर
यह सारे ही बड़े विधायक जिनका अपनी अपनी
जातियों में नाम है यह भाजपा की ओर चले
जाते हैं तो अंततः वहां पर कांग्रेस को
किसका सपोर्ट मिलेगा समाजवादी पार्टी के
नाम पर जो विधायक थे वोह तो पार्टी के साथ
रहे ही नहीं तो यह जो एक समर्थन समाजवादी
पार्टी हमेशा से देती आई है गठबंधन हो या
ना हो तो मुझे लगता है वह अब धीरे-धीरे
कमजोर होगा और इससे कांग्रेस को नुकसान ही
होना है हां कांग्रेस अपने जो भी वहां पर
परिवार के कैंडिडेट खड़े होते हैं उनकी
पर्सनल अपील पर और उनकी इमोशनल अपील पर
चुनाव लड़े तो ठीक है लेकिन समाजवादी
पार्टी से किसी भी तरह के समर्थन के आधार
पर उसके दम पर अगर वह चुनाव लड़ के जीतना
चाहते हैं तो यह मुझे थोड़ी वैसी
स्ट्रेटेजी लगती है जिस पर बहुत भरोसा
नहीं किया जा सकता राजनीतिक समीकरण कम से
कम और जो परिस्थिति है वह इस बात का संकेत
दे रही कि अगर प्रियंका और राहुल
दोनों अमेठी और राबडी से चुनाव लड़ते तो
इसका बहुत बड़ा कोई इंपैक्ट नहीं पड़ेगा
लेकिन यह जरूर है कि अभी कम से कम अमेठी
और रायबरेली को जनता को यह पता ही नहीं है
कि कांग्रेस का कौन सा उम्मीदवार उनके
क्षेत्र से चुनाव लड़ेगा और दूसरी तरफ
भाजपा का एक बड़ा प्रबंधन है तो ऐसे में
काफी मुश्किलें कम से कम कांग्रेस को आने
वाली है अगर प्रियंका और राहुल गांधी
अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ते हैं तो
लखनऊ से वनली सफल हसन के साथ निखिल शर्मा
न्यूज़ स्टेट उत्तर प्रदेश

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