Modi’s BJP & Election Ticket : मोदी का ऐलान..बीजेपी-संघ में बवाल !

दोस्तों नमस्कार यह मोदी काल है बीजेपी का
मोदी काल आरएसएस का मोदी काल इस देश के
भीतर में नेताओं की फेरि को लेकर मोदी काल
एक ऐसा मोदी काल जिसमें किसी दूसरे

कद्दावर नेता की कोई जरूरत बीजेपी के भीतर
भी नहीं है किसी की राजनीतिक जमीन कितनी
भी मजबूत क्यों ना हो और उसकी पहचान किसी
बड़े नेता के तौर पर ही क्यों ना हो उसकी

रत भी बीजेपी के भीतर नहीं है क्योंकि एक
ही नेता है एक ही चेहरा है और लोकप्रियता
के शिखर पर है एक ऐसा शिखर है जिसमें इस
देश के भीतर आप कहीं भी अपने चेहरे को

घुमाइए तो सिर्फ एक तस्वीर नजर आएगी और यह
तस्वीर आज दिल्ली में बीजेपी के महाधिवेशन
में पटी पड़ी थी हर पोस्टर पर एक दो नहीं
चारचार चेहरे वह भी एक ही शख्स के थे इस

शख्स का नाम नरेंद्र मोदी है एक ऐसे दौर
में बीजेपी और आरएसएस पहुंच चुकी है जहां
पर इस शख्स के आगे हर कोई नतमस्तक है एक
लंबी फेहरिस्त है इस देश के भीतर और
दुनिया के सामने जिसमें मोदी की

लोकप्रियता को लेकर कोई सवाल खड़ा कर नहीं
सकता है और सवाल तो दूर खुद के चेहरे और
खुद की राजनीतिक जमीन कितनी पुख्ता है यह
बताने की हिम्मत भी कर नहीं सकता है पता
नहीं कब कल किस तरीके से कौन सा नेता आने
वाले वक्त

में ध्रुव की तरह चमकने लगे और ध्रुव की
तरह चमकता हुआ नेता एक झटके में अंधेरे
में गायब हो जाए क्योंकि तय इस दौर में
प्रधानमंत्री मोदी को करना है किस राज्य

में कौन सीएम होगा कौन एमएल सीएम बना दिया
जाएगा किस सीएम को वापस अंधेरे में गुम कर
दिया जाएगा किस सांसद को विधायकी का चुनाव
लड़ना पड़ जाए और किस विधायक को संसद में
आना पड़ जाए सब कुछ एक एक ही व्यक्ति के
इशारे पर तय होगा तो बीजेपी के इस

लोकप्रिय चेहरे के इर्दगिर्द चाहे सोशल
मीडिया के किसी भी प्लेटफार्म पर आप चले
जाइए यह तस्वीर आपको बखूबी दिखाई देगी यह
तस्वीर हर मंत्रालय के वेबसाइट के पहले
पन्ने पर आपको नजर आएगी चाहे मंत्री किसी
भी मंत्रालय का कोई हो लेकिन यह चेहरा

सबसे ज्यादा चमकता हुआ और सबसे बड़े रूप
में आपको दिखाई देगा वो रेडियो होट
टेलीविजन हो न्यूज़ चैनल हो हर जगह पर यह
चेहरा लगातार आपको दिखाई देगा और इन सबके
बीच फिल्मों में भी अब प्रधानमंत्री मोदी

की छवि आपको दिखाई देने लगेगी इतना ही
नहीं इस देश में हर जगह होर्डिंग वो किसी
भी मंत्रालय से जुड़ा हुआ हो उसके किसी भी
कार्य को लेकर हो कोई भी कटआउट हो रेलवे
स्टेशन पर बकायदा सेल्फी अगर लेनी है
सरकार की उपलब्धियों के साथ तो

प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर चस्पा है
सेल्फी आप ले सकते हैं और इसके लिए
नौकरशाही लगी है देश के अलग-अलग हिस्सों
में सेना भी लगी है अलग-अलग साइट हो ऐप हो
यहां तक कि शहरों के चौराहे हो यहां तक कि
जो अलग-अलग हवाई अड्डे हो यहां तक कि जो
रेल स्टेशन हो यहां तक कि इस देश के जो
पेट्रोल पंप हो सरकारी संस्थान हो

प्लेटफार्म के इर्दगिर्द सिमट हुए सड़कों
पर निकलते हुए लोग हो तमाम जगहों पर
प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर आपको दिखा
देगी शहर दर शहर और इन सबके बीच घूमता हुआ
रथ जो ग्रामीण इलाकों में होगा जो विकसित
राष्ट्र की परिकल्पना कर रहा होगा वहां भी
आपको एक ही चेहरा एक ही नाम और वह नाम
मोदी सरकार के

नाम भारत की राजनीति का यह मोदी काल दरअसल
बीजेपी के भीतर भी हड़ कम पैदा कर चुका है
और संघ भी इस दौर में खामोश हो गया है
क्योंकि माना यही जाता था कि इस राष्ट्रीय

स्वयंसेवक संघ जो अभिभावक संगठन के तौर पर
है वह बीजेपी के संगठन को भी अपने इशारे
पर चलाता था रखता था और वह जानता समझता था
कि इस देश के भीतर स्वयंसेवक कहां किस रूप
में किस मुद्दे पर काम करेंगे और संगठन

कैसा होना चाहिए कौन सा प्रचारक बीजेपी
में जाएगा और किस प्रचारक के जरिए संगठन
को पुख्ता किया जाएगा लेकिन आरएसएस से यह
काम भी अब छीन लिया गया तो जब मंत्री कौन
बने मुख्यमंत्री कौन बनेगा बीजेपी अध्यक्ष

कौन बनेगा आरएसएस के जो सबसे संवेदनशील
संगठन है चाहे वह विश्व हिंदु परिषद हो वह
किसान संघ हो वह भारतीय मजदूर संघ हो वह
स्वदेशी जागरण मंच हो यानी सरकार की
नीतियों से टकराती हुई सामाजिक

परिस्थितियां जिसको आरएसएस अपने तौर पर
मथना चाहता हो उस संगठन का मुखिया भी
प्रधानमंत्री के इशारे पर होगा या वह जिन
नीतियों के आश्रय इस देश के भी भीतर सरकार
की नीतियों को लागू कराना चाहते हो उसमें

संघ भी एक कार्यकर्ता से ज्यादा आगे काम
करेगा नहीं राजनीतिक तौर पर अब सबसे बड़ा
चुनाव 2024 का लोकसभा चुनाव जब सामने है
तो आज महाधिवेशन की शुरुआत के साथ दो-तीन
बातें तय हो गई एक तो यह अब बीजेपी के
भीतर कोई कद्दावर नहीं कोई बड़ा नेता नहीं

कोई यह कह नहीं सकता है कि उसकी राजनीतिक
जमीन कितनी पुख्ता थी कोई यह बता नहीं
सकता है कि वह किस जाति की नुमाइंदगी करता
है और उसके जरिए कितने वोट आ सकते हैं सब
कुछ प्रधानमंत्री के साथ तय होगा तो आप यह

भी तय हो गया कि अगले लोकसभा चुनाव में
किसी नेता का नाम नहीं रहेगा नेता एक ही
है और उस नेता का नाम प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी है जिनके 10 वर्ष के काम
नहीं बल्कि 23 वरस का कच्चा चिट्ठा है और
उस कच्चे चिट्ठे को बताना है जो संवैधानिक

पद पर मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक 23
वर्ष तक रहे हैं उस दौर में उनके ऊपर ना
कोई दाग लगा ना कोई करप्शन का चार्ज लगा
और राजनीतिक तौर पर इतने मजबूत शख्स को
लेकर अब बीजेपी के हर कार्यकर्ता को चुनाव

लड़ना है और इस चुनाव में कोई दूसरा नेता
नहीं क्योंकि उम्मीदवार एक ही है और वह
उम्मीदवार है बीजेपी का चुनाव चिन्ह यानी
कमल का
सुन लीजिए प्रधानमंत्री ने क्या कहा और
फिर बीजेपी के महासचिव ने बाहर आकर जो

जानकारी दी कि प्रधानमंत्री क्या चाहते
हैं उसके कौन से संकेत हैं तो पहले इसे
सुन
लीजिए भारतीय जनता पार्टी और एनडीए जो सीट
लड़ रही

है उसमें भाजपा जो सीटें लड़ेगी
उसके
उम्मीदवार आज माननीय प्रधानमंत्री जी ने
घोषित
किए और उम्मीदवार है कमल का

फूल प्रक्रिया चयन तो चलता रहेगा लेकिन
कार्यकर्ताओं
को कमल का फूल जिताने के
लिए आने वाले 100 दिनों

का हर कार्यकर्ता कमर कस कर काम पर लगे
यानी बीजेपी के पुराने अनुभवी कद्दावर
मजबूत नेता अगर यह सोच रहे हैं कि उनका
नाम अगले लोकसभा चुनाव में तय है कि
उन्हें सीट मिल जाएगी तो वह भूल कर रहे

हैं क्योंकि बिल्कुल नई टीम आपको 2024 में
नजर आने वाली है कौन कहां से किसे टिकट
मिल जाए कोई नहीं जानता है और जो संसद में
पहुंचेगा उसके बाद जो मंत्री कौन बनेगा यह
भी कोई नहीं जानता है तो फिर कद्दावर की
लिस्ट में जो सोचते रहे चाहे वह राजनाथ

सिंह हो चाहे वह नितिन गडकरी हो चाहे वह
शिवराज सिंह चौहान हो चाहे व वसुंधरा
राजेश सिंधिया हो चाहे वोह यदुर पपा और
उनके बेटे ही क्यों ना हो चाहे वह रमन
सिंह ही क्यों ना हो चाहे बिहार से निकले

हुए सुशील मोदी हो रविशंकर प्रसाद हो
प्रकाश जावड़ेकर हो या फिर एक वक्त में
जिस तरीके से हिमाचल में धूमल हाशिए पर
किस तरीके से चले गए यह कोई नहीं जानता है
तो इस पूरी फरिश्तय कौन जानता था कि कल तक
के कृषि मंत्री एक झटके में विधायकी लड़ने
मध्य प्रदेश पहुंचेंगे किसे पता था कि जो
अपने आप को दिल्ली में कल तक कद्दावर

समझते थे उनको एमएलए का चुनाव लड़ना
पड़ेगा और उसके बाद भी वह मुख्यमंत्री
नहीं बनेंगे क्योंकि जो शख्स अपने तौर पर
चीजों को तय कर रहा है उसके सामने कोई
दूसरा ना कहने की स्थिति में है ना बोलने

की स्थिति में है कि दर असल वह पार्टी को
जिता देगा और सही मायने में इस वक्त
बीजेपी एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ी है जहां
इस दौर में उसे सबसे ज्यादा नरेंद्र मोदी

की जरूरत है और नरेंद्र मोदी को उतनी
जरूरत बीजेपी की नहीं है जितनी बीजेपी को
नरेंद्र मोदी की जरूरत है आप कहेंगे यह
कैसे संभव है अगर बीजेपी ना रहे आरएसएस ना

रहे तो फिर मोदी की पहचान क्या होगी यह
सही है लेकिन जब आप सरकार चलाते हैं और
सरकार के जरिए आप तमाम सुविधाएं देते हैं
तो उन सुविधाएं और ताकत का एहसास हर
कार्यकर्ता को होता है हर स्वयंसेवक को
होता है और यही फरिश्तय अपने कद को

नरेंद्र मोदी के जरिए किस तरीके से बीजेपी
ने भुनाया और बढ़ाया दोनों परिस्थिति को
समझिए यह सही है कि स्टार प्रचारक इस वक्त
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं स्टार

चेहरा वही है लेकिन एक सवाल आपके जहन में
यहां पर आ सकता है यह लड़ाई 370 सीट पाने
की है या 272 सीट तक पहुंचने की है
राजनीतिक तौर पर एक-एक सीट जोड़कर 370
पहुंचने का मतलब 2 तिहाई पार की स्थिति है
और 272 के नीचे रखने का मतलब है जो एक

पूरी की पूरी बड़ी प्रतिमा बनाई गई जो कि
जिंदगी से बड़ी यानी लार्जर देन लाइफ थी
कहीं वो डेढ़ा जाएगी तो बीजेपी भी कहीं पर
टिक नहीं पाएगी क्योंकि उसके पास भी कोई
अब ऐसा ब्रांड नहीं है और यहीं से सवाल
शुरू होता है क्या वाकई प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी इस दौर में खुद को अजय बता

रहे हैं कह रहे हैं है और इसीलिए जो
हड़कंप बीजेपी के भीतर है जो सोच और
खामोशी संघ के भीतर है उनके भीतर यह सवाल
है कि आखिर जनता के प्रति जवाबदेही का
सवाल इस दौर में गायब क्यों हो गया है इस
सवाल की नब्ज को पकड़ने से पहले यह समझिए

कि गरीबी है असमानता है बेरोजगारी है
व्यापारी परेशान है यूनिवर्सिटी के भीतर
भी शोर है शिक्षा महंगी हो गई है हेल्थ
सर्विस महंगी हो गई है इन तमाम मुद्दों को
कोई सड़क पर उठा रहा है कौन है वह शख्स वह
शख्स राहुल गांधी है जो आज प्रधानमंत्री

मोदी की कंसी में थे सुनना चाहिए उन्होंने
भी क्या कहा में दो सबसे बड़े मुद्दे हैं
कौन से मुद्दे
हैं
बेरोजगारी और
दूसरा बेरोजगारी
और अब जहां भी
देखो
आपको दो हिंदुस्तान
दिखेंगे एक अरबपति
वाला और एक गरीबों का
हिंदुस्तान
सही अब देखो यह मीडिया वाले एनई वाले यह
सब टीवी पकड़े हुए हैं यहां
पर इनको
देखो पीटीआई एन आई इंडिया टुडे नेटवर्क 10
नेटवर्क 12 नेटवर्क
14 य यह किसके हैं बताओ
जरा यह अदानी जी के अंबानी जी के यह उनके
हैं अब ये इनको
इनका यह किसान
का किसान के बारे में मजदूर के बारे में
गरीब के बारे में यह कभी नहीं दिखाने
वाले यह कर ही नहीं सकते इनके मालिक कहते
हैं भैया नहीं हिंदुस्तान के गरीबों के
बारे में मीडिया में नहीं दिखाना मीडिया
में कुछ दिखाना है तो नरेंद्र मोदी जी को
24 घंटा दिखाना है जो देश के मुद्दे हैं
उनके बारे में नहीं बोलना दरअसल राहुल
गांधी की इन बातों को लेकर विपक्ष कितना
ताकतवर है यह मायने लोकतंत्र में रहता
नहीं है क्योंकि नेता या सरकार की
जवाबदेही जनता को लेकर होती है और इस दौर
को अगर परखे कि अगर गरीबी है असमानता है
बेरोजगारी है मीडिया उसे दिखाता बताता
नहीं है तो लोगों के भीतर जो सवाल होंगे
उसमें खुद जनता ही यह जरूरत को महसूस करने
लगती है कि उसे क्या करना है और अगर वह
सोचती है कि सरकार बदलना है और जवाबदेही
खुद सरकार लेने को तैयार नहीं तब बुनियादी
उसूल लोकतंत्र का तो यही कहता है कि दरअसल
जवाबदेही नेता की होती है सरकार की होती
है और जवाबदेही से परे वह हमेशा रह नहीं
सकता है और अगर कोई जवाबदेही से परे है तो
फिर जीत किसकी होगी हार किसकी होगी यह
मुश्किल सवाल इसलिए नहीं क्योंकि लोकतंत्र
का तकाजा है कि दरअसल जनता सोचने लगी और
उसके बावजूद भी अगर यह मायने नहीं रखते
हैं और जवाबदेही से मुक्त अगर नेता और
सत्ता है तो मतलब है कि लोकतंत्र नहीं है
असल सवाल यहीं पर आकर फंस चुका है और भारत
की राजनीति में और बीजेपी के भीतर जो उठते
हुए सवाल तमाम कद्दावर नेताओं के सामने है
यही वह सवाल है कि उनकी पूरी राजनीति एक
लंबा राजनीतिक करियर एक ऐसे मोड़ पर आकर
थम गया रुक गया या हाशिए पर वह ढकेल जा
रहे हैं जहां पर अब उनको जरूरत थी कि वह
सत्ता का उपभोग कर सके अपने नेता के जरिए
उनके अपने जो कार्यकर्ता होते हैं वह भी
उसी रूप में आगे बढ़ते हैं लेकिन इस दौर
में बिल्कुल एक नई प्रक्रिया है पता नहीं
कल कौन मंत्री बन जाए कौन सांसद बन जाए
किसे टिकट मिल जाए कौन मुख्यमंत्री बन जाए
कौन राज्यपाल बन जाए कौन कहां पर कैसे
नियुक्त हो जाए क्यों इसलिए कि आपके पास
एक शानदार बोलने की ताकत है शानदार वक्ता
है आप शोमैन है आम लोगों से जुड़ने का
हुनर है और हर चीज को मेगा इवेंट में
कन्वर्ट कर देना बदल देना और इस दौर में
दुनिया भर के नेताओं के साथ जब तस्वीर
चस्पा होती है प्रधानमंत्री मोदी की तो यह
आवाज बीजे बपी के भीतर से निकाली जाती है
कि देखिए कल तक यह हमारे गुरु थे अब यह
विश्व गुरु हो गए राजनीतिक तौर पर यह आज
महाधिवेशन के भीतर भी खुलकर नजर आ रहा था
जब पोस्टर अलग-अलग जगह पर सम्मेलन सभा के
भीतर बाहर प्रधानमंत्री मोदी ही एकमात्र
चमकते हुए सितारे के तौर पर मौजूद थे इन
तस्वीरों को देखिए बहुत चीजें साफ
होंगी

इस राजनीतिक परिदृश्य से अगर नरेंद्र मोदी
को आप हटा दें तो बीजेपी कहां टिकती है इस
दौर में ध्यान दीजिए बीजेपी की नीति सरकार
की ही नीति है जब वह मुख्यमंत्री थे उस
दौर में मुख्यमंत्री ऑफिस ही केंद्र था
पूरी सत्ता का और सरकार वहीं से चलती थी
इस दौर में जब प्रधानमंत्री हैं तो पीएमओ
ही केंद्र है इस दौर में सरकार को चलाने
से ले कर इस देश के भीतर में बीजेपी को
कैसे चलना है संघ को किस रास्ते को पकड़ना
है और जो भी मुद्दे चले आ रहे थे लंबे
संघर्ष के साथ उसको किस मोड़ पर समाधान
देना है या उसको निपटाना है उसकी राजनीतिक
जरूरतें कितनी है और राजनीतिक लाभ कितना
होगा और उसके साथ प्रधानमंत्री मोदी का कद
कैसे बढ़ेगा सब कुछ इस दौर में पीएमओ तय
करता है तो एक सवाल यह भी है कि
मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक के सफर
में इस दौर में 2024 के चुनाव के वक्त में
इन 23 वर्ष को जोड़कर अब कार्यकर्ताओं को
घर-घर जाना है बूथ बूथ जाना है उन जगहों
पर वोटिंग परसेंटेज को बढ़ाना है और यह
परिस्थिति बहुत साफ तौर पर बतलाती है कि
दरअसल इस दौर में केंद्र के बीच में अगर
प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर है तो वह
अगले चुनाव में कौन नेता मंत्री सांसद और
किस रूप में किसकी नियुक्ति होगी य वही तय
करेंगे क्योंकि सवाल अब सिर्फ 10 बरस का
नहीं है बल्कि उस नरेंद्र मोदी का है जो
2001 में मुख्यमंत्री बने थे और तब से
लेकर अब तक के राजनीतिक सफर के बीच में
अगर आप आकलन शुरू कीजिएगा तो एक बड़ी
पहचान इस दौर में नितिन गडकरी की भी थी इस
दौर में पहचान राजनाथ सिंह की भी थी कई
कद्दावर नेताओं की थी और आज जब महाधिवेशन
में मुरली मनोहर जोशी पहुंचे तो बीजेपी के
एक शख्स ने हस्ते मुस्कुराते हुए जो करीब
थे उनसे पूछ ही लिया डॉक्टर साहब अब आपकी
तबीयत कैसी
है उनका कहना था मेरी तबीयत को क्या हुआ
ठीक तो हू नहीं आप अयोध्या नहीं गए थे और
उसके बाद उन्होंने खामोशी बरत ली राजनीतिक
तौर पर बीजेपी के भीतर खामोशी को बरतना और
प्रतिक्रिया ना देना और राजनीतिक तौर पर
एक ही प्रतिक्रिया को पत्थर की लकीर मान
लेना यह सब कुछ मौजूदा हकीकत है जो मोदी
काल है और इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी को
किस रूप में अब कार्यकर्ताओं को रखना है
इसका जिक्र भी विनोद तावड़े जो
प्रधानमंत्री के भाषण के बाहर बाद बाहर
निकलकर बता रहे थे तो उन्होंने बताया कि
अब 10 बरस नहीं 23 वर्ष के सफर का जिक्र
कीजिए पिछले 10 साल का केंद्र
सरकार का
कामकाज और स्वयं माननीय प्रधानमंत्री मोदी
जी संविधानिक पद पर आए हुए 23 साल
हुए एक भी भ्रष्टाचार का आरोप
नहीं ऐसे भ्रष्टाचार
मुक्त आरोप
मुक्त विकास के
आधारित जो हमने सफलता पाई
है वह हम मतदाताओं के
पास
सामान्य व्यक्ति के पास बात
पहुंचाए कि 23 साल के कार्यकाल
में इस देश में कोई भी
ऐसी सरकार या संवैधानिक पद की व्यक्ति
नहीं
रही कि जिस पर कुछ आरोप हुए लेकिन यह पहला
समय है कि ऐसे आरोप मुक्त और
विकास के आधार पर विकास
युक्त यह सरकार यह कार्यकाल रहा ये जनता
के पास ले जाने का आग्रह आदरणीय
प्रधानमंत्री जी ने हम सब पदाधिकारियों को
संबोधित करते हुए
कहा तो कार्यकर्ताओं को बीजेपी या आरएसएस
को याद नहीं करना है 23 बरस जो
प्रधानमंत्री मोदी का संवैधानिक पद पर
रहना हुआ मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक
और उनकी जो छवि है उसी छवि को जनता के
सामने रखना है इसी बात का जिक्र आज
महाधिवेशन में हुआ और सवाल यह भी है कि
2001 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के
मुख्यमंत्री बने थे उस वक्त राजनाथ सिंह
का कद कहीं बड़ा था उस दौर में नितिन
गडकरी का कद कहीं बड़ा था और सही मायने
में कहे तो 2014 से पहले दोनों नेताओं का
कद बड़ा था और दोनों के सामने अब अगर यह
सवाल उभर जाएगा कि अब टिकट उन्हें नहीं
मिलेगा तो दोनों सोचेंगे जरूर क्योंकि एक
तरफ राजनाथ सिंह गाजियाबाद से चुनाव लड़े
लखनऊ से चुनाव लड़े दूसरी तरफ नितिन गडकरी
नागपुर से चुनाव लड़े उन्हें दोनों वक्त
50 फीदी से ज्यादा वोट मिला दोनों को मिला
50 फीदी से ज्यादा तकरीबन 53 54 55 56 पर
तक वोट मिले हैं 2014 और 201 2019 में तो
क्या इनका टिकट भी कट सकता है सवाल इसके
आगे का है क्योंकि इस दौर में
जिस नव राष्ट्रवाद का बिंब उभर रहा है
प्रधानमंत्री मोदी के जरिए और
अंतरराष्ट्रीय गुरु के तौर पर पहचान पाने
के लिए वह बेचैन है और भारत के भीतर धर्म
निरपेक्षता बनाम हिंदुत्व की जो लड़ाई संघ
लड़ ना सका उसे बहुत ही शालीनता के साथ
प्रधानमंत्री मोदी अगर नीतियों के आश्रय
परोस रहे हैं और उसके भीतर उग्र
राष्ट्रवाद भी है नव राष्ट्रवाद भी है
लाभार्थियों की एक पूरी फौज उन्हें नजर
आती है जहां पर अनाज का बांटना हो शौचालय
का बनना हो किसानों को सीधे बैंक में पैसा
ट्रांसफर हो या फिर प्रधानमंत्री आवास
योजना हो एक लंबी फेरि है जो इस देश के
लगभग
3040 करोड़ लोगों को अनाज से हटकर लाभ
पहुंचाती है उन्हें लगता है यह जीत मिल
जाएगी और फिर संगठन और लड़ने की क्षमता जो
भी है बीजेपी के भीतर इस परिस्थिति को अगर
समझिए तो बीजेपी का
संगठन धन की कोई कमी नहीं चुनाव जीतने की
मंशा और एक बड़ा कैडर इस देश के भीतर में
उस कैडर के सामने अब यह उम्मीद जाग गई पता
नहीं कब किस दिन प्रधानमंत्री मोदी की नजर
अगर उन पर पड़ गई तो वह सीधे संसद के भीतर
होंगे या फिर किसी राज्य के मुख्यमंत्री
होंगे यह उम्मीद जब निचले कैडर तक चली गई
तो फिर ऊपर में बैठे कद्दावर
नेता और बड़े नेता और राजनीतिक जमीन पर
पकड़ रखने वाले नेता और अपनी जीत को लेकर
आशान्वित पूरी तरीके से रहने वाले
नेता उनके लिए कार्यकर्ता काम करेगा या उस
नरेंद्र मोदी के लिए काम करेगा जिन्होंने
उम्मीद जगा दी है मैं ही तय करूंगा कौन
संसद तक पहुंचेगा कौन मंत्री बनेगा कौन
मुख्यमंत्री बनेगा कौन राज्यपाल बनेगा
किसको कौन सा पद मिलेगा यह
परिस्थिति नई है नायाब है लेकिन एक क्षण
के लिए याद कीजिए ब्राजील का बोलें सोर
कौन जानते थे चुनाव वो हार जाएंगे लूला
चुनाव जीत जाएंगे वह हार गए ट्रंप बेहद
लोकप्रिय अमेरिका में कौन जानता था वह
चुनाव हार जाएंगे वह चुनाव हार गए इंदिरा
गांधी कौन जानता था वह चुनाव हार जाएंगी
उन्होंने तो इमरजेंसी के बाद चुनाव ही यह
सोच कर कराया था कि जीत जाएंगे चुनाव हार
गई कौन जानता था अटल बिहारी वाजपेई चुनाव
हार जाएंगे 2004 में चुनाव हार
गए तो 2024 आपके सामने है तय आप ही को
करना है बहुत-बहुत शुक्रिया बहुत-बहुत
शुक्रिया

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